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खाटियों में क्या खोट था जो नहीं मिला विधानसभा का टिकट

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गाजियाबाद जनपद के राजनैतिक इतिहास को उठाकर देखा जाएं तो चंद नेता ही ऐसे हैं जिन्होंने सफल राजनैतिक पारियां खेली हैं, और संसद से लेकर यूपी विधानसभा तक में जोरदार दस्तक दी है। दर्जनों नेता ऐसे हैं जिन्होंने यूपी विधानसभा में लंबी पारियां खेली, और अपने वजूद को जनता में बनाये रखा। सफल नेताओं के साथ जनपद में ऐसे भी नेताओं की भरमार है, जिन्होंने समय दर समय अपनी किश्मत को चमकाने की जोर अजमाइश की, लेकिन नेताओं की जोर अजमाइश धरी की धरी रह गई, और आज भी अपने वजूद को कायम रखने की दिशा में संघर्ष किया जा रहा है। लोकसभा, विधानसभा चुनाव में इन सभी नेताओं ने टिकट पाने का जुगाड़ लगाया, लेकिन पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व ने इनकी दावेदारी को या तो सिरे से नकार दिया या फिर दूसरा विकल्प तलाश कर, टिकट किसी ओर नेता को थमा दिया। लंबे समय से राजनैतिक पार्टियां इन नेताओं के सामर्थ्य का तो इस्तेमाल कर रही हैं, लेकिन जब चुनाव में टिकट वितरण की बात आती है तो पार्टियां इन नेताओं की ओर से मुह मोड़ लेती हैं। 

 

जनपद गाजियाबाद में सबसे पहले बात करते हैं कांग्रेस पार्टी की, कांग्रेस में ऐसे नेताओं की भरमार है, जिन्हें पार्टी ने कभी चुनाव में नहीं उतारा, लेकिन ऐसे नेताओं ने टिकट पाने का जुगाड़ अंतिम समय तक लगाया। (latest ghaziabad hindi news) जिन नेताओं को टिकट नहीं दिए, उन्हें संगठन में पद देकर शांत कर दिया गया, और संगठन स्तर पर ऐसे नेताओं ने अपने मन को शांत किया।
कांग्रेस में नरेंद्र भारद्वाज ऐसा नाम है जो लंबे समय से पार्टी की सेवा कर रहे हैं, पिछले एक दशक से श्री भारद्वाज टिकट पाने के लिए संघर्षरत हैं, उन्होंने कई बार विधानसभा के टिकट की दावेदारी की, लेकिन उनकी दावेदारी को पार्टी ने सिरे से नकार दिया। श्री भारद्वाज लंबे समय से कांग्रेस से जुड़े हुए हैं, और उनकी पार्टी के शीर्ष नेताओं में अच्छी खासी पहचान भी है।
नरेंद्र राठी भी लंबे समय से कांग्रेस में हैं और उन्होंने भी वर्ष-2012 में हुए विधानसभा चुनाव में साहिबाबाद विधानसभा सीट के लिए दावेदारी की, लेकिन उनकी दावेदारी को साइड में कर, पार्टी आलाकमान ने टिकट सतीश त्यागी को सौंपा। इसके अलावा श्री राठी ने वर्ष-2012 में हुए नगर निगम चुनाव में मेयर का टिकट शीर्ष नेतृत्व से मांगा, इस टिकट पर भी उन्हें मायूसी ही हाथ लगी और टिकट कांग्रेस के विजय चौधरी को दिया गया। श्री राठी ढ़ाई दशकों से सक्रिय राजनीति कर रहे हैं।
दिनेश कौशिक भी लंबे समय से कांग्रेस का झंडा उठाये हुए हैं और उन्होंने कांग्रेस सेवादल जिलाध्यक्ष का दायित्व लंबे समय से संभाला हुआ है। श्री कौशिक की ओर से भी पिछले कई चुनावों में टिकट के लिए दावेदारी की गई। पार्टी शीर्ष नेतृत्व ने उनकी दावेदारी पर कोई गौर नहीं फरमाई, आज भी श्री कौशिक कांग्रेस सेवादल में जिले का दायित्व संभाले हुए हैं और उनकी गिनती पार्टी में वरिष्ठ नेताओं के रूप में की जाती है।
डाक्टर संजीव शर्मा की गिनती वरिष्ठ कांग्रेसियों में होती है, श्री शर्मा को मनरेगा योजना में मेरठ मंडल का दायित्व सौंपा गया, लेकिन उन्हें किसी चुनाव में पार्टी ने टिकट नहीं दिया। हॉलाकि उनके द्वारा टिकट के लिए कई बार दावेदारी की गई, लेकिन उनकी दावेदारी पर पार्टी ने कभी कोई गंभीरता नहीं दिखाई।
पूर्व महानगर अध्यक्ष ओमप्रकाश शर्मा उन कांग्रेसियों में गिने जाते हैं, जो पार्टी के लिए पूर्णरूप से समर्पित हैं और पार्टी की सच्चे मन से सेवा कर रहे हैं। श्री शर्मा के समर्पित भाव को देखते हुए पार्टी ने उन्हें लंबे समय तक महानगर की कुर्सी पर बैठाये रखा। श्री शर्मा की ओर से भी विधानसभा चुनाव के लिए दावेदारी ठोंकी गई, लेकिन श्री शर्मा की दावेदारी पर भी पार्टी नेतृत्व ने कोई गंभीरता नहीं दिखाई।
आज श्री शर्मा संगठन की राजनीति से जुड़े हुए हैं और पार्टी को मजबूत करने का काम कर रहे हैं।
वीके अग्निहोत्री की गिनती भी वरिष्ठ कांग्रेसियों में होती है और आज श्री अग्निहोत्री महानगर अध्यक्ष का दायित्व संभाल रहे हैं। श्री अग्निहोत्री चार दशकों से कांग्रेस की सेवा कर रहे हैं और पार्टी ने आज तक उन्हें किसी भी चुनाव में बतौर प्रत्याशी के रूप में नहीं उतारा। उनकी तरफ से भी कई बार टिकट के लिए दावेदारी की गई, दावेदारी सिर्फ कागजों तक सीमित रही।
बबली नागर की बात की जाए तो पार्टी में उनका एक अलग स्थान है, वह लंबे समय से पार्टी की सेवा कर रहे हैं। श्री नागर के भाई राजकुमार नागर रह चुके हैं और राजकुमार नागर की पत्नी नगर निगम में पार्षद है। श्री नागर की ओर से भी कई चुनावों में दावेदारी की गई, लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने भी उन्हें कोई टिकट नहीं दिया, जिस कारण श्री नागर संगठन की राजनीति कर रहे हैं।
पूर्व जिलाध्यक्ष बिजेंद्र यादव कांग्रेस में ऐसे नेता हैं, जिनका नाम सम्मान से लिया जाता है। श्री यादव लंबे अर्से से कांग्रेस की सेवा कर रहे हैं, लेकिन पार्टी ने आज तक श्री यादव को कोई चुनाव नहीं लड़वाया है। वर्ष-2012 में हुए नगर निगम चुनाव में उन्होंने मेयर सीट के लिए दावेदारी की थी, नामांकन के अंतिम दिन उनका टिकट काटकर विजय चौधरी को सौंप दिया गया था। श्री यादव वर्तमान में प्रदेश कमेटी में महासचिव के पद पर कार्यरत हैं, और पार्टी की सेवा कर रहे हैं।
पूर्व कार्यवाहक जिलाध्यक्ष हाजी लियाकत अली भी कांग्रेस के उन सिपाहियों में गिने जाते हैं जो पार्टी के पूर्णरूप से समर्पित हैं। पार्टी ने उनके ऊपर भी आज तक किसी चुनाव का दांव नहीं खेला है, पार्टी की सच्चे मन से सेवा कर रहे हैं, और कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी शतप्रतिशत खरी उतरती है।
वीरसिंह जाटव की बात की जाए तो वह कांग्रेस का दामन लंबे समय से थामे हुए हैं। नगर निगम में पार्षद रहकर पार्टी को मजबूती प्रदान की, और संगठन में आज भी सक्रियता बनाये हुए हैं। श्री जाटव की ओर से भी कई
बार टिकट की दावेदारी की गई है, लेकिन पार्टी आलाकमान अपने एक ही ढर्रे पर चलते हुए पार्टी के अन्य नेताओं की अनदेखी कर रहा है।
लोकेश चौधरी कांग्रेस में कई पदों पर रह चुके हैं और जब भी चुनाव आता है, तो वह अपनी दावेदारी जरूर करते हैं। नगर निगम चुनाव में भी उन्होंने मेयर सीट के लिए दावेदारी की थी, मेयर के चुनाव में टिकट नहीं मिला। इसके अलावा वह कांग्रेस के सभी कार्यक्रमों में प्रमुखता से नजर आते हैं और सक्रिय राजनीति में बने हुए हैं।
राजाराम भारती कांग्रेस में उन नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन पार्टी को सौंप दिया है। युवा अवस्था से ही भारती कांग्रेस में सक्रिय रहे, लेकिन पार्टी ने आज तक उन्हें कोई मजबूत दायित्व नहीं सौंपा।
पार्टी में श्री भारती सच्ची निष्ठा के साथ लगे रहते हैं, वर्तमान में श्री भारती पीसीसी मैम्बर हैं और जिला उपाध्यक्ष का दायित्व निर्वाहन कर रहे हैं।

 

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की बात की जाएं तो सबसे पहले महानगर अध्यक्ष अशोक मोंगा की करते हैं। श्री मोंगा लंबे समय से संगठन की राजनीति कर रहे हैं और महानगर अध्यक्ष पद का दायित्व निभा रहे हैं। श्री मोंगा का जो भी कार्यकाल रहा, उसमें पार्टी स्थानीय स्तर पर मजबूत हुई। श्री मोंगा ने भी संगठन में रहते हुए पिछले कई चुनावों में टिकट की इच्छा प्रकट की, लेकिन पार्टी ने उन पर चुनाव का दांव नहीं खेला है। श्री मोंगा वर्तमान में भाजपा महानगर अध्यक्ष हैं।
पूर्व सांसद व वर्तमान गृहमंत्री भारत सरकार के सांसद प्रतिनिधि रहे बलदेवराज शर्मा भी भाजपा में लंबे समय से हैं, हॉलाकि एक समय उन्होंने पार्टी की नीतियों रूष्ठ होकर बसपा का दामन थाम लिया था और चंद दिनों के भीतर ही बसपा को छोड़कर फिर भाजपा में शामिल हो गये थे। श्री शर्मा के ऊपर भी पार्टी शीर्ष नेतृत्व ने चुनाव लड़ाने का कोई दांव नहीं खेला है। फिलहाल श्री शर्मा इन दिनों भाजपा की केंद्रीय टीम के सदस्य हैं, और केंद्रीय टीम के कामकाज में व्यस्त हैं।
राजा वर्मा भी उन्हीं नेताओं में शुमार हैं, जिन्हें पार्टी ने आज तक कोई टिकट नहीं दिया है। मेयर सीट के लिए वर्ष-2012 में उन्होंने अपनी दावेदारी की थी, लेकिन अंतिम क्षणों में उनका टिकट काट दिया गया था, आज भी श्री वर्मा सक्रिय राजनीति कर रहे हैं।
पृथ्वी सिंह लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं और पार्टी की सच्चे मन से सेवा कर रहे हैं। श्री सिंह को भी पार्टी ने कोई टिकट नहीं दिया है, उनकी तरफ से इस बार लोनी विधानसभा सीट के लिए दावेदारी की जा रही है, देखते हैं आने वाले समय में उनकी दावेदारी को पार्टी मजबूती से लेती है या फिर पूर्व की तरह ही नाम सिर्फ दावेदारी तक ही सीमित रहेगा और टिकट किसी ओर को मिल जायेगा।
पूर्व महानगर अध्यक्ष चंद्रमोहन शर्मा भाजपा में ऐसा चेहरा है, जो पार्टी को मजबूत करने वालों में गिना जाता है। श्री शर्मा की ओर से भी कई बार टिकट के लिए दावेदारी की गई, लेकिन उनकी दावेदारी पर भी शीर्ष नेतृत्व ने कोई विचार नहीं किया है।
पूर्व महानगर अध्यक्ष सरदार एसपी सिंह भी ऐसे नेताओं में शामिल हैं जिन्हें पार्टी ने कोई चुनाव नहीं लड़ाया है। हॉलाकि श्री सिंह अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य रह चुके हैं। श्री सिंह की ओर से भी वर्ष-2012 में हुए नगर निगम चुनाव में मेयर सीट के लिए दावेदारी की गई थी।
पांच बार से लगातार पार्षद चुने आ रहे अनिल स्वामी का भाजपा में आज एक बड़ा कद है। श्री स्वामी ने वर्ष-2012 में हुए विधानसभा चुनाव में शहर सीट से दावेदारी की थी, लेकिन उनकी दावेदारी को दरकिनार करते हुए पार्टी ने टिकट भाजपा नेता अतुल गर्ग को सौंप दिया था। अभी भी श्री स्वामी आगामी वर्ष-2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे हुए हैं, उन्हें भरोसा है कि इस बार पार्टी उनके नाम पर जरूर विचार करेगी।
जगदीश साधना भी ऐसे नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने पार्टी को अपना शतप्रतिशत योगदान दिया है, पार्टी ने आज तक उन्हें कोई चुनाव नहीं लड़वाया है। श्री साधना आज भी पार्टी के प्रत्येक कार्यक्रम में नजर आते हैं और युवाओं को प्रेरित करने का काम कर रहे हैं।
पूर्व पार्षद विजय मोहन भी पार्टी में सक्रिय भूमिका अदा कर रहे हैं। उनकी सक्रियता का आलम यह हैं कि चुनाव के दौरान वह पूरी मेहनत के साथ प्रचार प्रसार में जुटते हैं। पार्टी ने श्री मोहन के नाम पर भी आज तक कोई विचार नहीं किया है, उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं सौंपा है।
पार्षद सरदार सिंह भाटी कई बार से विधानसभा चुनाव में टिकट मांग रहे हैं, लेकिन पार्टी उनके नाम पर कोई विचार नहीं कर पाई है। श्री भाटी वर्ष-2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियां कर रहे हैं और साहिबाबाद सीट से टिकट के लिए जोर अजमाइश कर रहे हैं।
प्रदीप चौहान की बात की जाए तो श्री चौहान लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी की गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। श्री चौहान का अपने समाज में अच्छा खासा दबदबा है और भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें कभी विधानसभा चुनाव में नहीं उतारा।
अशोक गोयल की बात की जाए तो लंबे समय से वह भारतीय जनता पार्टी में हैं और कई बार चुनाव में टिकट की दावेदारी भी कर चुके हैं। दावेदारी करने के बाद भी उन्हें आज तक पार्टी ने किसी भी विधानसभा से टिकट नहीं दिया है। श्री गोयल का कद प्रदेश स्तरीय होने के बाद भी उनकी उपेक्षा हो रही है। सुधीर चौधरी, हातम सिंह नागर भी भाजपा में अलग अलग विधानसभा सीटों से टिकट की जोर अजमाइश में लगे हुए हैं। तीनों नेता अपने अपने मातहत नेताओं से संपर्क साधे हुए हैं और टिकट की मजबूत पैरवी कर रहे हैं। पार्टी के इन नेताओं की अनदेखी शीर्ष स्तर पर हो रही है, पार्टी के बड़े नेताओं को समय रहते स्थानीय नेताओं को लेकर सोच बदलनी होगी, नहीं तो स्थानीय नेताओं की सक्रियता समय दर समय घटती रहेगी।

 

सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में भी ऐसे नेताओं की भरमार है, जिनके ऊपर पार्टी ने कभी चुनाव का दांव नहीं खेला। पार्टी के लिए समर्पित नेताओें के ऊपर से बाहर से प्रत्याशी लाकर बैठा दिया गया, जिसे सपाईयों ने पूरी मेहनत के साथ चुनाव लड़वाया। सबसे पहले हम बात करते हैं पूर्व महानगर अध्यक्ष धर्मवीर डबास की। श्री डबास सपा में ढाई दशक से हैं और पार्टी की सेवा कर रहे हैं। श्री डबास नगर निगम में पार्षद भी रहे हैं और पिछले वर्ष उन्हें सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने महानगर अध्यक्ष भी बनाया था, लेकिन किन्हीं कारणों के चलते पिछले दिनों ही उन्हें पद से हटा दिया गया। श्री डबास की ओर से विधानसभा चुनाव को लेकर दावेदारी की जाती रही हैं,हॉलाकि वह कभी सामने नहीं आये, लेकिन पार्टी ने उन्हें कभी चुनाव नहीं लड़वाया।
राहुल चौधरी की गिनती सपा के पुराने नेताओं में होती है। डेढ़ दशक से श्री चौधरी सपा में सक्रिय राजनीति कर रहे हैं और पार्टी में वह कई महत्तवपूर्ण पदो पर भी रहे हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की टीम में श्री चौधरी की गिनती होती है, लेकिन उन्हें भी विधानसभा चुनाव लड़ने का अभी तक कोई मौका नहीं मिला है।
पूर्व महानगर महासचिव व वर्तमान जिला महासचिव जेपी कश्यप भी पार्टी के वफादार नेताओं में हैं उन्हें भी पार्टी ने कभी विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं दिया। आज भी श्री कश्यप सक्रिय राजनीति कर रहे हैं और सपा संगठन को मजबूत करने का काम कर रहे हैं।
पूर्व महानगर अध्यक्ष रामकिशोर अग्रवाल भी सपा में ऐसे नेता हैं जिनका स्थानीय स्तर पर कद बड़ा है। कद बड़ा होने के बाद भी पार्टी ने उन्हें कोई चुनाव नहीं लड़वाया। एक बार पार्टी ने बतौर प्रत्याशी घोषित भी कर दिया, लेकिन बाद में उन्हें हटा दिया गया। वर्तमान में श्री अग्रवाल जीडीए बोर्ड मैम्बर के रूप में पार्टी की सेवा कर रहे हैं।
संजय बाली समाजवादी पार्टी में सयुश जिलाध्यक्ष पद पर लंबे समय तक रहे हैं और पिछले डेढ़ दशक से सपा में सक्रिय राजनीति कर रहे हैं। श्री बाली पार्टी के लिए पूर्णरूप से समर्पित हैं।
सपा की पूर्व महिला जिलाध्यक्ष मधु चौधरी की बात की जाए तो वह पार्टी में सक्रिय राजनीति कर रही हैं, लेकिन पार्टी की ओर से उन्हें कोई मजबूत जिम्मेदारी अभी तक नहीं सौंपी गई है। विधानसभा चुनाव में श्रीमति चौधरी की अनदेखी की जाती रही है। वर्तमान में श्रीमति चौधरी पार्टी की निष्ठाभाव से सेवा कर रही हैं।

 

अब बात करते हैं बहुजन समाज पार्टी की, बसपा में कई चेहरें ऐसे हैं जिन्होंने चंद दिनों में ही अपनी लगन और निष्ठा से अपना नाम रोशन किया, लेकिन पार्टी ने उन पर चुनाव का दाव नहीं खेला। जिलाध्यक्ष प्रेमचंद भारती फिलहाल संगठन की राजनीति कर रहे हैं, उनके मन में भी इच्छा है कि पार्टी उन्हें जनपद की किसी सीट से टिकट दें, और वह विधानसभा पहुंचे, लेकिन पार्टी की ओर से उनके नाम पर किसी तरह का कोई विचार नहीं होता दिख रहा है। श्री भारती फिलहाल जिला संगठन को मजबूत करने में जुटे हुए हैं।
पूर्व जिलाध्यक्ष रामप्रसाद प्रधान यूं तो जिला सहकारी बैंक के चेयरमैन रहे हैं, लेकिन पार्टी के इस मजबूत सिपाही पर भी बसपा ने चुनाव का दाव नहीं खेला है। श्री प्रधान के नेतृत्व में चुनाव तो लड़वाये गये, लेकिन उन्हें टिकट दिया जाए, इस तरफ पार्टी नेताओं ने विचार नहीं किया है, हॉलाकि उनकी भी इच्छा है कि पार्टी उन्हें जनपद की किसी सीट से टिकट दे, ताकि वह चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंच सकें। पूर्व जिलाध्यक्ष विरेंद्र जाटव, पूर्व मेयर प्रत्याशी श्यामवीर चौधरी वर्ष-2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपने लिए टिकट की दावेदारी करेंगे।

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बार एसोसिएशन चुनाव: तारीख को लेकर संशय बरकरार

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फरवरी के प्रथम सप्ताह में चुनाव होने की अटकले तेज
वर्तमान कार्यकारिणी ने चुनाव को लेकर उत्पन्न विवाद में बार काउंसिल आॅफ इंडिया का खटखटाया दरवाजा
गाजियाबाद (करंट क्राइम)। बार एसोसिएशन चुनाव को लेकर वर्तमान कार्यकारिणी और वरिष्ठ अधिवक्ताओं के बीच पैदा हुए विवाद के चलते चुनाव स्थिगित वाले मोड़ में आ गये हैं। तारीख को लेकर कोई स्पष्ट स्थिति नहीं बनी है और वर्तमान बार कार्यकारिणी ने अब बार काउंसिल आॅफ इंडिया का दरवाजा खटखटा दिया है। विवाद के चलते अभी तक ये भी तय नहीं हो पाया है कि बार एसोसिएशन का चुनाव 25-15 या फिर 20-10 वाले पैटर्न पर होगा या फिर नहीं। फिलहाल कचहरी परिसर में अटकले तेज हो गई हैं कि बार एसोसिएशन का चुनाव फरवरी माह के प्रथम सप्ताह में सम्पन्न कराया जा सकता है।
बता दें कि बार एसोसिएशन चुनाव को लेकर कई बार विरोधात्तक स्थिति देखने को मिल चुकी है। कभी एल्डर कमेटी का विवाद सामने आया है तो कभी अध्यक्ष एवं सचिव के उम्र वाले पैटर्न पर विवाद खड़ा हो चुका है। एल्डर कमेटी को लेकर सहमति बनना बताया जा रहा है कि राम अवतार गुप्ता की एल्डर कमेटी के नेतृत्व में चुनाव सम्पन्न कराया जायेगा। लेकिन अभी तक उम्र वाले पैटर्न को लेकर विवाद बना हुआ है। बताया जा रहा है कि चुनाव में हुए विवाद को लेकर वर्तमान बार कार्यकारिणी ने बार काउंसिल आॅफ इंडिया का दरवाजा खटखटा दिया है।
20-10 वाले पैटर्न में इन दावेदारों की दावेदारियां हैं प्रमुख
अभी हाल में बार एसोसिएशन चुनाव को लेकर अध्यक्ष के लिए 20 वर्ष एवं सचिव के लिए 10 वर्ष का अनुभव तय किया गया था। उक्त उम्र व्यवस्था के चलते अध्यक्ष पद के लिए तीन दावेदार जिसमें पूर्व अध्यक्ष रहे राकेश त्यागी काकड़ा, पूर्व अध्यक्ष राकेश त्यागी कैली और पूर्व में सचिव रहे दीपक शर्मा की दावेदारियां प्रबल थी। वहीं सचिव पद के लिए पांच अधिवक्ताओं की ओर से दावेदारियां की गई थी। सचिव पद के लिए स्नेह त्यागी, विनित शर्मा, अमित नेहरा, हरेंद्र गौतम, लोकेश कुमार आदि के नाम प्रमुख बताये जा रहे हैं। अब देखना होगा कि बार चुनाव में किस उम्र के पैटर्न को बार काउंसिल आॅफ इंडिया परमिशन देगा।
2500 अधिवक्ताओं की
लिस्ट हो चुकी है तैयार
बार एसोसिएशन चुनाव में अभी तक 2500 अधिवक्ता मतदाताओं की सूची तैयार कर ली गई है। चंूकि चुनाव स्थिगित हो गये हैं लिहाजा एक बार फिर से मतदाता अधिवक्ताओं की सूची को संशोधित करने का काम किया जायेगा। बताया जा रहा है कि संशोधित मतदाता अधिवक्ताओं की सूची में करीब 300 अधिवक्ताओं के नाम ओर शामिल किये जा सकते हैं।
पंजीकृत या फिर सीओपी धारक ही कर सकेंगे बार चुनाव में मतदान
बार एसोसिएशन की तरफ से चुनाव को लेकर पूर्व में ही घोषणा की गई थी कि चुनाव में पंजीकृत अधिवक्ता या फिर सीओपी धारक ही मतदान में हिस्सा ले सकेंगे। बार काउंसिल आॅफ उत्तर प्रदेश से सबंद्ध अधिवक्ता अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेगा। बार चुनाव की गाइड लाइन में उक्त को प्रमुखता से लागू किया जायेगा।

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गंगाजल की धारा ले लेगी गाजियाबाद की ओर मोड़

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यदि जीडीए और नगर निगम उपलब्ध करा दें 442 करोड़
गाजियाबाद (करंट क्राइम)। आबादी के साथ बुनियादी जरूरतें भी बढ़ रही हैं और इनमें से एक सबसे बड़ी जरूरत पानी की है। दिल्ली से सटे गाजियाबाद में आबादी का अनुपात बढ़ा है और इसी अनुपात में पानी की जरूरत भी बढ़ी है। यहां पानी की जरूरत को कैसे मैनेज किया जायेगा, इसे लेकर जिलाधिकारी गाजियाबाद आरके सिंह ने कई विभागों को साथ लेकर बैठक की। इस बैठक में मुख्य विषय यही था कि ऊपरी गंगा नहर प्रणाली से गाजियाबाद नगर निगम को 100 क्यूसेक कच्चा जल उपलब्ध कराया जाये। यहां पर जल निगम के अधिक्षण अभियंता ने अवगत कराया कि 250 क्यूसेक पानी की जरूरत है और इस जरूरत के सापेक्ष सिंचाई विभाग ऊपरी गंगा नहर प्रणाली द्वारा 100 क्यूसेक जल उपलब्ध कराया जा सकता है। यहां पर जब डीएम राकेश कुमार सिंह ने जल की उपलब्धता को लेकर सवाल किया तो सिंचाई निर्माण खंड के अधिशासी अभियंता संजय सिंह जादौन ने बताया कि यह एक नीतिगत मामला है और इस पर शासन की अनुमति से ही जल उपलब्ध कराया जा सकता है। इसके लिए 442.38 करोड़ की परियोजना तैयार कर स्वीकृति के लिए भेजी गयी थी। परियोजना पर होने वाले इस खर्च को जीडीए तथा नगर निगम द्वारा किया जाना है। इन्हीं दोनो विभागों को इस परियोजना पर होने वाले इस खर्च को देना है। यदि जीडीए और नगर निगम इस धन की व्यवस्था कर देंगे तो ऊपरी गंग नहर प्रणाली से 100 क्यूसेक कच्चा जल गाजियाबाद को दिया जा सकता है।
अधिशासी अभियंता बोले हमने दिये थे सुझाव नहीं मिले आदेश
गाजियाबाद की आने वाली सबसे बड़ी जरूरत यहां का भू जल है। जल की आपूर्ति के लिए नहरों और अन्य साधनों से भी जल चाहिए। जल को लेकर बुधवार को कलेक्ट्रेट में डीएम की अध्यक्षता में बैठक हुई। इस बैठक में पानी की उपलब्धता को लेकर और पानी की बचत को लेकर सभी विभागों के अधिकारियों ने अपनी राय रखी। इस बैठक में सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता मेरठ नीरज कुमार लांबा ने बताया कि गंगा नहर प्रणाली के अंतर्गत नहरों की लाईनिंग करके पानी की बचत की जा सकती है। लेकिन उच्च अधिकारियों
द्वारा नहरों की लाईनिंग कराये जाने के विषय में कोई आदेश प्राप्त नहीं हुए हैं।

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लखनऊ वाली बैठक से निकले हैं कई संदेश, निगम चुनाव में नहीं मिलेगी परिवारवाद को तवज्जो और कार्यकर्ताओं पर रहेगा फोकस

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वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सोमवार को भाजपा प्रदेश कार्यालय पर जो बैठक हुई उस बैठक से संदेश राष्टÑ से लेकर प्रदेश और क्षेत्र ये लेकर जिले तक आ रहे है। सूत्र बताते हैं कि बैठक में कई मुद्दों पर चर्चा हुई लेकिन यहां फोकस में लोकसभा चुनाव और निगम चुनाव रहे है। बैठक कई दौर में हुई। इस बैठक में प्रदेश प्रभारी से लेकर मोर्चों के अध्यक्ष भी शामिल रहे है। क्षेत्रीय पदाधिकारी भी मौजूद थे और कई दौर की इस बैठक में राष्टÑीय महामंत्री बीएल संतोष और उत्तर प्रदेश प्रभारी राधा मोहन सिंह भी थे।
प्रदेश संगठन के सभी पदाधिकारी थे और सूत्र बता रहे हैं कि यहां पर साफ कर दिया गया है कि नेतृत्व के विकास में परिवारवाद के लिए कोई जगह नहीं होगी। भ्रष्टाचार और लालच के लिए कोई जगह नहीं होगी। कार्यकर्ता काम कर रहे है, उन्हें आगे लाना प्रथम प्राथमिकता है। यदि ऐसा होगा तभी एक सक्षम संदेश कार्यकर्ताओं के बीच जाएगा।
सरकार और संगठन के बीच समन्वय होना बहुत जरूरी
लखनऊ वाली बैठक में जब भाजपा के सारे कर्णधार नेता एकसाथ बैठे तो चिंतन-मनन केवल चुनाव पर ही नहीं हुआ बल्कि सरकार और संगठन को लेकर भी विचार रखे गए। बताया जाता है कि यहां स्पष्ट किया गया कि सरकार और संगठन के बीच समन्वय होना बहुत जरूरी है। क्योंकि जब सरकार और संगठन के बीच समन्वय होता है तभी पार्टी मजबूत होती है। तभी पार्टी की शक्ति बढ़ती है।
मोर्चों के अध्यक्ष विशेष रूप
से संकल्प पत्र पर दे ध्यान
लखनऊ वाली बैठक में केवल संगठन ही नहीं बल्कि फ्रंटल संगठन की कार्यशैली को लेकर भी चर्चा हुई। मोर्चों को विशेष रूप से अहम माना गया है और यह कहा गया कि किसान मोर्चा, ओबीसी मोर्चा और अल्पसंख्यक मोर्चा सहित सभी मोर्चों के अध्यक्षों को पार्टी के संकल्प पत्र के हर बिंदु पर ध्यान देना है। जो भी बिंदु उनके मोर्चे से संबंधित है उस पर काम करना है। दायित्व केवल दिखावे के लिए न लें। जो भी दायित्व ले उस पर काम करें।
नए चेहरों के साथ सभी समाज को मिले समान प्रतिनिधित्व
उत्तर प्रदेश भाजपा की मैराथन बैठक में 2024 का चुनाव रहा है और साथ ही निगम के चुनाव पर भी फोकस रहा है। निगम चुनाव को लेकर कहा गया है कि यदि रिजल्ट यहीं ठीक नहीं रहा तो फिर 2024 में मजबूती से चुनाव कैसे लड़ेंगे।
बैठक में युवाओं को आगे लाने की बात कही गई है और नए चेहरों के साथ नई लीडरशिप विकसित होने का सीन बन रहा है। यहां पर ये भी तय किया गया है कि भले ही किसी समाज की वोट कम हैं लेकिन हर समाज को संगठन से लेकर सरकार तक प्रतिनिधित्व मिलें। इस तरह से स्वरूप तैयार हो कि हर समाज के लोग भाजपा के साथ समाज की विकास यात्रा में मुख्यधारा में साथ रहे।

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