Connect with us

अन्य ख़बरें

जब गाजियाबाद की धरती पर उतर आया देवभूमि उत्तराखंड का सांस्कृतिक स्वरूप

Published

on

उत्तराखंड से केंद्रीय मंत्री से लेकर राज्य मंत्री और मेयर ने जोड़ लिया खुद का नाता, विविधता में एकता का अनूठा संदेश
गाजियाबाद (करंट क्राइम)। भारतीय जनता पार्टी जो भी आयोजन करती है उसमें उसके पार्टी के शीर्ष नेताओं से लेकर लोकल स्तर के कार्यकर्ता तक जुट जाते हैं और मिलने वाले हर टास्कों को सफल बना देते हैं। सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन की श्रंखला में मनाए जा रहे कार्यक्रम के तहत सेवा पखवाड़ा चल रहा है। इसके तहत विविधता में एकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसकी थीम उत्तराखंड रही। कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री एवं सांसद जनरल वीके सिंह से लेकर उत्तर प्रदेश सरकार के स्वतंत्र प्रभार मंत्री नरेंद्र कश्यप, महापौर आशा शर्मा, विधायक सुनील शर्मा, शहर विधायाक अतुल गर्ग, अजीतपाल त्यागी, महानगर अध्यक्ष संजीव शर्मा की उपस्थिति और उत्तराखंड के प्रमुख लोक कलाकार राजेंद्र चौहान और कल्पना चौहान की प्रस्तुति न इसे नए शिखर तक पहुंचा और इस कार्यक्रम की शान बढ़ा दी। कार्यक्रम में भाजपा का हर पदाधिकारी उत्तराखंडी टोपी में नजर आया, तो महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा पहन कर आईं। खुद महापौर उत्तराखंड की वेशभूषा में पहुंची। वहीं सभी अतिथियों को उत्तराखंड का प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित भी किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत मां नंदा देवी की डोलाा यात्रा से शुरू हुई। कार्यक्रम में एक से एक गीत और खानपान उत्तराखंड के लोगों को एहसास कराया गया कि वह भाजपा के साथ जुड़े हैं तो उनके प्रदेश और समाज को सम्मान मिल रहा है। कार्यक्रम में पहुंचे सभी अतिथियों ने उत्तराखंड की देवभूमि के महत्व को बताया। तो वहीं संस्कृति और कला की धरती से अपना रिश्ता भी बताना कोई नहीं भूला। इस दौरान देव भूमि के मंदिरों, प्रमुख चेहरों व शहीद विपिन रावत के कट आउट लगाए गए थे।
उत्तराखंड की बेटी को किया
है याद, रखा गया मौन
सेवा पखवाड़े के अंतर्गत मनाए जा रहे हैं कि विविधता में एकता कार्यक्रम के दौरान उत्तराखंड की बेटी अंकिता की निर्मम हत्या किए जाने के मामले में वहां मौजूद समाज के लोगों और भाजपा पदाधिकारियों व नेताओं ने दो मिनट का मौन रखते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। साथ सरकार और पुलिस प्रशासन से पूरे मामले में निष्पक्ष जांच और कार्रवाई के लिए भी कहा गया।
उत्तराखंडी परिधानों में
पहुंची महापौर
महापौर आशा शर्मा की बेटी की उत्तराखंड में ससुराल है। उत्तराखंड समाज को भारतीय जनता पार्टी से जोड़ने और वहां की कला संस्कृति को जन जन तक पहुंचाने के मकसद से आयोजित इस कार्यक्रम में पहुंची जिले की प्रथम नागरिक महापौर आशा शर्मा ने भी उत्तराखंड से अपना नाता बता दिया। बताया गया कि आशा शर्मा की बेटी की ससुराल उत्तराखंड में है। साथ ही महापौर आशा शर्मा खुद उत्तराखंड के पारंपरिक वेशभूषा में पहुंची थी। उन्होंने वस्त्र के साथ आभूषण भी उत्तराखंडी शैली के पहने हुए थे, जो काफी मनमोहक नजर आ रहे थे। उन्होंने तमाम लोगों के संग सेल्फी भी ली।
अजीत पाल त्यागी ने बताया 10 साल तक उत्तराखंड में ली थी शिक्षा
मुरादनगर से विधायक अजीत पाल त्यागी भी कार्यक्रम में पहुंचे थे और उन्होंने भी अपने छात्र जीवन के दिन याद करते हुए बताया कि उत्तराखंड में उन्होंने लगभग 10 साल तक पढ़ाई की है। वह यहां की यूनिवर्सिटी में विद्यालय से जुड़े रहे हैं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड देश का एक ऐसा हिस्सा है ,जहां की प्राकृतिक सुंदरता हमेशा उनको पसंद आती है और जो वहां पहुंचता है उसका दीवाना हो जाता है।
अशु वर्मा ने कहा देव नहीं वीरभूमि है उत्तराखंड
पूर्व महापौर और भाजपा के वरिष्ठ नेता अशु वर्मा ने इस अवसर पर कहा कि उत्तराखंड केवल देवभूमि नहीं वह वीरभूमि भी है। उन्होंने इस दौरान यह भी कहा कि जिस भी क्षेत्र और वहां के लोगों की आलोचना हो तो समझ लीजिए कि वह एक शिखर तक पहुंच रहे हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी, आरएसएस और अजीत डोभाल की चर्चा और आलोचना की जा रही है। उन पर टारगेट किया जा रहा है, जो दशार्ता है कि उत्तराखंड के अजीत डोभाल भी आज लोगों के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं वे देश के मजबूत अधिकारियों में से एक हैं।

अन्य ख़बरें

46 साल 11 दिन बाद जनपद गाजियाबाद घोषित हुआ पुलिस कमिश्नरेट

Published

on

गाजियाबाद में तीन तहसील, चार ब्लॉक व 24 हैं थाने
गाजियाबाद (करंट क्राइम)। दिल्ली से जनपद गाजियाबाद भी अब पुलिस कमिश्नरेट बन गया है। शुक्रवार को यूपी सरकार कैबिनेट की बैठक में इसे मंजूरी मिल दी गई। 14 नवंबर 1976 को गाजियाबाद अलग जिला बना। पंडित जवाहर लाल नेहरू की जयंती पर तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने इसे जिला घोषित किया था। इससे पहले ये मेरठ जिले का हिस्सा हुआ करता था। नोएडा की दादरी, हापुड़ की हापुड़ और गढ़मुक्तेश्वर तहसील भी पहले गाजियाबाद जिले का हिस्सा होती थीं। जब हापुड़ और नोएडा नए जिले बने तो गाजियाबाद की तीन तहसीलें उनमें चली गईं। अब गाजियाबाद में तीन तहसील, चार ब्लॉक और 24 पुलिस स्टेशन हैं। गाजियाबाद की सीमाएं दिल्ली से सटी हैं, इसलिए इसे गेटवे आॅफ यूपी भी कहा जाता है। गाजियाबाद से मेरठ, नोएडा और दिल्ली एकदम सटे हुए हैं।
गाजियाबाद में नगर निगम की स्थापना 31 अगस्त 1994 को हुई। नगर निगम का एरिया 220 वर्गकिलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। 2011 की जनगणना के हिसाब से जिले की आबादी 46 लाख 61 हजार 452 है।
पुलिस को मिल जाएंगी ये शक्तियां
अब तक बड़े शहरों में ही यह व्यवस्था लागू थी। अब आगरा में भी यह व्यवस्था लागू होगी। इसके बाद शांति भंग और 107-116 की कार्रवाई में एसीपी की कोर्ट में पेश होना होगा। आईपीएस अधिकारियों की संख्या बढ़ेगी। आपात स्थिति में कार्रवाई के लिए जिलाधिकारी सहित अन्य अधिकारियों के आदेश का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। पुलिस कमिश्नर खुद फैसला लेकर कार्रवाई के लिए निर्देशित कर सकेंगे। प्रदर्शन, किसी आयोजन, रूट प्लान की अनुमति आदि के लिए जिलाधिकारी के पास नहीं जाना होगा।
दंगा होने की स्थिति में कितनी फोर्स लगाई जानी है। लाठीचार्ज करना है या नहीं, इसकी अनुमति भी नहीं लेनी पड़ेगी। होटल, बार और हथियार के लाइसेंस देने का अधिकार भी पुलिस कमिश्नर के पास होगा। जमीन से संबंधित विवाद के निस्तारण के लिए भी अधिकार पुलिस के पास ही पहुंच जाएंगे।
इस व्यवस्था के बाद ये होंगे पुलिस के पद
पुलिस आयुक्त या पुलिस कमिश्नर (सीपी)। संयुक्त आयुक्त या ज्वाइंट कमिश्नर (जेसीपी)। डिप्टी कमिश्नर (डीसीपी)। सहायक आयुक्त (एसीपी)। पुलिस इंस्पेक्टर। सब इंस्पेक्टर।
——-

अब डीएम नहीं दे सकेंगे कानून व्यवस्था संबंधी कोई निर्देश
(करंट क्राइम)। पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम लागू होने के बाद डीएम के कई अधिकार पुलिस कमिश्नर को मिल जाते हैं। इसमें पुलिसकर्मियों के तबादले अब कमिश्नर स्तर पर हो सकेंगे। लाठी चार्ज या फायरिंग के आदेश पुलिस कमिश्नर दे सकते हैं। जिन जिलोंं में यह सिस्टम लागू नहीं है, वहां डीएम के पास सीआरपीसी कानून- व्यवस्था संबंधी कई अधिकार होते है। पुलिस कमिश्नरी सिस्टम में ये सारे अधिकार डीएम की बजाय सीधे पुलिस कमिश्नर के पास होंगे।

Continue Reading

अन्य ख़बरें

सब जानते हैं इंद्रजीत सिंह टीटू का हमेशा रहता है नेक ईरादा

Published

on

मूर्ति ना सही पत्थर पर नाम लिखवाकर पूरा करें सुच्चा सिंह के परिवार से किया वादा
गाजियाबाद (करंट क्राइम)। दशमेश वाटिका एक लम्बे संघर्ष के बाद सिख समाज को मिली है। दशमेश वाटिका के संघर्ष में जब भी कोई नाम आयेगा तो यहां इंद्रजीत सिंह टीटू का नाम सबसे पहले आयेगा। लेकिन एक नाम ऐसा है जो अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन दशमेश वाटिका के संघर्ष में इस नाम को कभी भुलाया नही जायेगा। ये नाम सरदार सुच्चा सिंह का है, जो अब इस दुनिया मे नही है। हाल ही में यहां एक एतिहासिक कार्यक्रम हुआ और इस कार्यक्रम के आयोजन में, सिख समाज की शौर्य गाथा को सजीव रूप से बताने में सरदार इंद्रजीत सिंह टीटू की अहम भूमिका रही। सरदार इंद्रजीत सिंह टीटू हमेशा से धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं और उनकी कोशिश हमेशा सबको साथ लेकर चलने की और सबको आगे बढ़ावा देने की रहती है। दशमेश वाटिका की बात करें तो दस साल का संघर्ष रहा है और हाल ही में जब यहां ब्रिटिश सेना के अधिकारी भी आये तो यहां पर स्वर्गीय सरदार सुच्चा सिंह के परिजनों को भी बुलाया गया था। यहां पर नामों की चर्चा हुई लेकिन जब बात मूर्तियों के इतिहास से लेकर पत्थर पर दर्ज होने की आयी तो यहां सुच्चा सिंह और उनके परिवार के इसी सदस्य का नाम दर्ज नहीं हुआ। परिजनों ने याद दिलाया है कि दो साल पहले इंद्रजीत सिंह टीटू ने ही शिब्बनपुरा के गुरुद्वारा में दशमेश वाटिका में सुच्चा सिंह का स्टैच्यु लगाने की बात कही थी। उनकी श्रृद्धांजलि सभा में ये बात कही गयी थी और ईधर ये कहा गया कि सरदार इंद्रजीत सिंह टीटू का हमेशा से नेक ईरादा रहता है और वो अपना वादा भी पूरा करेंगे।
दशमेश वाटिका की लिस्ट 40 में हों संघर्ष यात्रा में शामिल लोगों के नाम
दशमेश वाटिका ऐसे ही सिख समाज को नही मिली है। यहां एक लम्बा संघर्ष सिख समाज ने किया है। इन नामों का जिक्र होगा तो यहां पूर्व पार्षद धीरेन्द्र बिल्लु का भी नाम आयेगा।
यहां इंद्रजीत टीटू का भी नाम आयेगा तो सरदार सुच्चा सिंह का भी नाम आयेगा। ये वो लोग हैं और कई नाम हैं जिन्होंने संघर्ष किया है। यदि इस संघर्ष यात्रा के फोटो से लेकर खबरों की कटिंग निकाली जायेगी तो यहां सुच्चा सिंह का फोटो हर तीसरी खबर में आयेगा। सुच्चा सिंह के परिवार की भी तमन्ना है कि लिस्ट 40 में उन्हें भी स्थान मिले। जिस व्यक्ति ने संघर्ष किया है उसके परिवार के किसी सदस्य का नाम इस लिस्ट में नही है।
———–

सुच्चा सिंह के सुपुत्र मनप्रीत ने कहा पिता के संघर्ष की दास्तां हो दर्ज

स्वर्गीय सुच्चा सिंह के सुपुत्र मनप्रीत सिंह मन्नी और उनके चचेरे भाई अशमीत सिंह करंट क्राइम मुख्यालय पहुंचे। यहां उन्होंने कहा कि दो साल पहले पिता के निधन के बाद श्रृद्धांजलि सभा में परिवार को आर्थिक सहायता देने की बात कही गयी थी, जो आजतक नहीं मिली। लेकिन हमें आर्थिक सहायता नही चाहिए। वादा तो मूर्ति लगवाने का भी हुआ था लेकिन मूर्ति भी नहीं चाहिए मगर हमारे पिता स्वर्गीय सुच्चा सिंह ने दशमेश वाटिका के लिए संघर्ष किया है और हम चाहते हैं कि पिता के संघर्ष की दास्तां यहां दर्ज हो। एक पत्थर हमारे पिता के नाम पर भी यहां लगाया जाये।

Continue Reading

अन्य ख़बरें

भगवागढ़ की सियासी जमीन पर ऐसे ही नही हो रही है रिश्तों की ये केयर

Published

on

कुछ तो बन रहा है सियासी समीकरण क्योंकि ये सीन होता है बहुत ही रेयर
वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)

गाजियाबाद। सियासत में कभी भी चीजें अचानक नही होती हैं। ये ठीक उस बारिश की तरह होती हैं जो हमें बादल के रूप में दिखाई तो अचानक देती हैं लेकिन इनके आने की भूमिका आसमान में काफी पहले तैयार हो रही होती है। भगवा गढ़ में विधानसभा और लोकसभा वाली राहें अब जुदा-जुदा सी दिखायी देती हैं। जुबान भले ही खामोश है लेकिन लहजे बता रहे हैं कि लिहाज अब उतना नही रहा जितना पहले रिवाज हुआ करता था। अगर वो बदल रहे हैं तो फिर बहुत कुछ बदल रहा है और भगवा गढ़ की सियासी जमीन पर रिश्तों की नयी फसल तैयार हो रही है। ऐसे ही रिश्तों की केयर नहीं की जा रही है और वो देखने को मिल रहा है जो अक्सर पहले रेयर होता था। अब मेयर चुनाव से पहले ये सब देखने को मिल रहा है। विधानसभा में टोली अलग है तो लोकसभा की बोली भी अब अलग हो रही है। नये समीकरण बन रहे हैं और उथल पुथल के मंथन में रिश्तों की नयी इबारत तैयार हो रही है। सियासी लोग इस नयी आहट को भांप रहे हैं और वो भी अब अधिक जानकारी के लिए भाजपा वालों में ही झांक रहे हैं। कहीं साहब की हमदर्दी अधिक है तो कहीं दीदी ने नये रिश्ते बनाये हैं। मंच पर ये रिश्ते नजर आये हैं।
दिनेश गोयल का अलग स्टैण्ड बता दिया बिना नाम लिये पार्टी के अगेंस्ट
जब लोकसभा में समीकरण बदल रहे हैं तो इफेक्ट वहां भी हैं जिन्हें गैर विवादित कहा जाता है। एमएलसी दिनेश गोयल इस कहानी में साईलेंट मोड पर नहीं रहे। वो सामने आये और उन्होंने अलग से स्टैण्ड लिया। उन्होंने तो नाम लिये बिना ही कह दिया कि जो अपने सांसद के लिए ऐसा कह रहे हैं या कर रहे हैं तो वो एक तरह से पार्टी के अगेंस्ट जा रहे हैं। उन्होंने जनरल वीके सिंह को सबसे बेस्ट बताया और उनके चुनाव लड़ने के सवाल पर कोई शक ही नही जताया। उन्होंने यहां सीधे सीधे खुद को पार्टी स्टैण्ड के साथ सांसद के साथ खड़ा किया।
जनरल ने दिया संदेश गम की घड़ी में साथ खड़े हैं हम
कहानी में किरदार बदले हैं और दिलदार वही हैं। राजनीति में संदेश दिये जाते हैं और नये किरदार के साथ ये संदेश जनरल वीके सिंह ने दिया है। भाजपा नेता अशोक मोंगा के भाई का निधन हुआ तो जनरल वीके सिंह शोक व्यक्त करने अशोक मोंगा के घर पहुंचे। एक बार नहीं दो बार पहुंचे और शोक व्यक्त करने के लिए बैठे तो घड़ी की सुईयां नहीं देखीं। ये संदेश दिया कि अशोक मोंगा हम तुम्हारे गम की घड़ी में साथ हैं।
केवल राजनीति की सबकुछ नही होती, रिश्ते भी होते हैं। इसके बाद अशोक मोंगा के भाई की शोक सभा में भी जनरल वीके सिंह पहुंचे। ये संदेश उन्हीं लोगों के लिए था जहां जनरल संदेश पहुंचाना चाहते थे।
रिश्तों की खिली बहार जब दीदी के साथ ये चेहरे दिखे
एक साथ
पहले बताया था कि राजनीति में बिना वजह कुछ नही होता। रिश्तों के पौधे पर स्रेह का फूल आया है। आईएमएस में आयोजित कार्यक्रम का ये चित्र यही संदेश लेकर आया है। इस कार्यक्रम में जनरल वीके सिंह को आना था, वो नहीं पहुंचे तो उनकी पुत्री मृणालिनी सिंह पहुंची। चित्र में राजनीति वालों के लिए विचित्र बात ये है कि इस चित्र में मृणालिनी सिंह के साथ एमएलसी दिनेश गोयल हैं तो दूसरी तरफ भाजपा नेता अशोक मोंगा हैं। ये संदेश है कि हम साथ साथ हैं। रिश्तों की ये बहार बता रही है कि इफेक्ट चुनाव से लेकर सरकार तक दिखाई देंगे। अशोक मोंगा भाजपा का पुराना समर्पित कार्यकर्ता वाला चेहरा हैं और पंजाबी समाज से मेयर वाली दावेदारी में ये नाम चल रहा है। वहीं एमएलसी दिनेश गोयल का नाम मंत्री मंडल वाली लिस्ट में कभी भी ट्विस्ट करा सकता है। नये समीकरण हैं और राजनीति की नयी जमीन तैयार हो
रही है।

 

Continue Reading

Trending

%d bloggers like this: