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दीपिका की ‘माइ चॉइस’ के क्या हैं मायने?

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दीपिका पादुकोण और ‘माइ चॉइस’ (मेरी मर्जी) जबरदस्त सुर्खियों में है। कब तक रहेंगे नहीं मालूम। (bollywood news in hindi) मशहूर फैशन मैगजीन ‘वोग’ के लिए दीपिका पादुकोण की यह शॉर्ट फिल्म अब भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में स्त्रियों की आजादी को लेकर जबर्दस्त चर्चा का विषय बनी हुई है।

करीब 2 मिनट 34 सेकेंड की इस छोटी सी डॉक्यूमेंट्री में दीपिका महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर अपनी पसंद यानी ‘माइ चॉइस’ को जिस तरह से बता रही है, उससे 65 फीसदी युवाओं की आबादी वाले इस देश में क्या संदेश जा रहा है, इस पर बहस शुरू हो गई है।

हां, जवाब में 1 मिनट 32 सेकेंड का ‘माइ चॉइस’ मेल वर्जन भी सामने आ गया है। इसमें पुरुषों की मानसिकता को सामने रखने की कोशिश की गई है। कंटेंट दोनों ही शॉर्ट फिल्मों में अपनी-अपनी सोच के हैं। दोनों ही वीडियो इंटरनेट पर जबदस्त वायरल हो रहे हैं। इन्हें देखने वालों की संख्या आसमान छू रही है।

‘माइ चॉइस’ में दीपिका को यह कहते हुए दिखाया गया है- “मैं शादी करूं या न करूं, मेरी मर्जी, शादी से पहले सेक्स करूं या शादी के बाद भी किसी से रिश्ते रखूं मेरा मन, किसी पुरुष से प्यार करूं या महिला से या फिर दोनों से, मेरी मर्जी। मुझसे जुड़े सारे फैसले मेरे हैं, ये मेरा हक है।”

यकीनन शरीर उनका है तो सोच भी उनकी है और फैसले का हक भी। यक्षप्रश्न सिर्फ यही है यह विखंडन का रास्ता है या बदलाव का या महिलाओं के उत्थान का? क्या सिर्फ यौन स्वेच्छचरिता से महिलाएं आत्मनिर्भर हो जाएंगी, समृद्धि की राह पर चल निकलेंगी, समाज में बराबरी का हक मिल जाएगा। पता नहीं, भारतीय परिवेश में पली बढ़ी दीपिका पादुकोण के इस नए तेवर में स्त्रियों के हक और अपनी शर्तो पर जिंदगी जीने की बात से क्या कुछ हासिल होने वाला है, समझ से परे है।

दीपिका के वीडियो में स्त्री सशक्तीकरण की आड़ में पुरुषों की कुंठित मानसिकता को बदलने की सोच है या उन्मुक्तता की आड़ में वहां ले जाने का संदेश, जहां जीना तो सबको है पर जिम्मेदारी किसी की नहीं है।

क्या इस वीडियो से महिलाओं में भी वर्ग भेद किए जाने की बू नहीं आती? क्या वीडियो देखने के बाद महिलाओं के सामान्य और अभिजात वर्ग का भान नहीं होता? ‘माइ चॉइस’ में दीपिका पादुकोण ने जो कहा है, वह महिला स्वतंत्रता और सोच बदलने की बात है या फिर केवल यौन उन्मुक्तता का संदेश? जिस तरह से यौन उन्मुक्तता की बात की गई है, क्या वह हमारे समाज में कभी स्वीकार किया जाएगा? वीडियो में महज शारीरिक स्वतंत्रता या यौन उन्मुक्तता की ही बात है, क्या इससे पुरुषों का स्त्रियों के प्रति चला आ रहा नजरिया बदल जाएगा?

तो फिर यह वीडियो स्त्रियों को कैसे मुखर बनाता है? किन मामलों में मुखर बनाता है? इसी बात की बहस शुरू हो गई है, हो सकता है इसे बनाने का मकसद भी यही हो। इस वीडियो के बाद आए मेल वर्जन की चर्चा भी जरूरी है। इसमें पुरुष को अपनी ओर से सफाई देते हुए दिखाया गया है जो कहता है कि मैं घर आने में लेट हो जाता हूं तो इसका यह मतलब नहीं कि धोखा दे रहा हूं।

इस वीडियो में एक छोटी-सी क्लिपिंग भी है, जिसमें एक महिला अपने पति के साथ मारपीट कर रही है, क्योंकि पति का शादी के बाद भी दूसरी महिला से विवाहेतर संबंध हैं। हो सकता है, इस वीडियो में दीपिका की मनमर्जी की अभिव्यक्ति और पुरुष की मनमर्जी का हश्र बताने का मकसद हो। हां मेल वर्जन में एक शानदार संदेश जरूर अंत में लिखा है ‘रिस्पेक्ट वुमन एंड मैन’।

मर्जी की हद को लेकर ये जो वीडियो है, इस पर समाज दो धड़ों में बंटता दिख रहा है। लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या दीपिका पादुकोण महिलाओं के सामाजिक बंधनों को तोड़ने और स्त्री स्वातं˜य के नाम पर मनमर्जी के लिए उकसा नहीं रही हैं? या फिर सशक्तीकरण के नाम पर उन्हें जागरूक कर रही हैं?

दीपिका का यह वीडियो कहीं जाने या अनजाने ही सही, जिद को प्रेरित करते हुए समाज में वो माहौल पैदा करना चाहता है जहां नैतिकता का स्थान तो दूर की बात ‘माइ चॉइस’ के नाम पर मूल्यों का पतन हो और सामाजिक सरोकारों से कोई मतलब न रहे। तब तो इसका मतलब यही होगा- मैं ये करूं या वो करूं मेरी मर्जी…! इतना खुलापन तो अभी पाश्चात्य देशों में भी नहीं दिख रहा है।

भारत में सामाजिक सरोकारों की जड़े 21 वीं सदी के इस दौर में भी काफी गहरी हैं, आस्था, विश्वास और सामाजिक मयार्दाएं शेष हैं। ऐसे में वीडियो से सामाजिक विघटन का संदेश जाने से इतर और क्या है। दूसरे शब्दों में यह वीडियो खासकर युवतियों को खुले सेक्स के लिए भी तो एक तरह से उकसा ही रहा है!

‘माइ चॉइस’ सामाजिक बंधनों की बलि भी चढ़ा रहा है और खुले आम विद्रोह जैसी बात कह रहा है। ये कैसी सोच है। इसके पैरोकार भी बड़ी तादाद में खुलकर सामने आ रहे हैं। लोग अपने-अपने तर्क दे रहे हैं। सवाल यह है कि हासिल क्या हो रहा है?

हां, पुरुषों को भी सोचने को जरूर मजबूर होना पड़ेगा। कहीं ये संदेश तो नहीं कि बलात्कार करना पुरुष की चॉइस हो सकती है। स्त्री को भोग की वस्तु समझना पुरुष की चॉइस हो सकती है। कपड़ों को बदलने के माफिक स्त्रियों का उपभोग पुरुष की चॉइस हो सकती है। पुरुष अपनी मर्जी से महिला के साथ कभी भी, कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है? महिला बेचारी..! बस पुरुष की इच्छा के अधीन ही रहे..।

एक बड़ा सवाल यह भी है कुछ ही दिन पहले बीबीसी-फोर की डॉक्यूमेंट्री ‘इंडियाज डॉटर’ को लेकर खूब हाय तौबा हुई संसद तक में हंगामा हुआ और माननीयों को भी नागवार गुजरा। न्यायिक दखल के बाद यह डॉक्यूमेंट्री भारत में प्रतिबंधित हो गई। ‘माइ चॉइस’ से क्या संदेश जा रहा है, किस तरह की सोच को जाहिर किया जा रहा है, इसको लेकर समाज के पहरुए चुप क्यों हैं।

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विक्रम वेधा के बाद पुष्कर गायत्री ला रहे क्राइम सीरीज, प्राइम वीडियो पर इस दिन होगी रिलीज

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नई दिल्ली। यह साल दक्षिण भारत के नाम रहा। फिल्में हों या कलाकार। दक्षिण भारतीय भाषाओं का कंटेंट खूब चला। इसीलिए, कई ऐसी फिल्में और सीरीज आयीं, जिन्हें हिंदी में भी रिलीज किया गया। इसी क्रम में वधांधी- द फेबल ऑफ वेलोनी आ रही है। मूल रूप से यह तमिल क्राइम थ्रिलर है, जिसे तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ के साथ हिंदी में भी स्ट्रीम किया जाएगा। सीरीज का ट्रेलर मंगलवार को जारी कर दिया गया।

क्या है सीरीज की कहानी?

वधांधी की कहानी के केंद्र में एक ईमानदार और तेजतर्रार पुलिस अफसर विवेक है, जो 18 साल की वेलोनी के कत्ल की गुत्थी सुलझाने में लगा है। कत्ल को बाद वेलोनी को लेकर कुछ अफवाहें फैलने लगती हैं, जो उसकी छवि को बिगाड़ रही हैं। विवेक के सामने यह भी एक चुनौती है कि जल्दी से केस सुलझाकर इन अफवाहों पर विराम लगाये।

सीरीज की स्टार कास्ट

वधांधी से तमिल एक्टर एसजे सूर्या ओटीटी डेब्यू कर रहे हैं। विवेक का किरदार उन्होंने ही निभाया है। सीरीज का निर्माण पुष्कर और गायत्री ने किया है, जिनकी फिल्म विक्रम वेधा में ऋतिक रोशन और सैफ अली खान ने लीड रोल्स निभाये थे। उनके अलावा नासर, विवेक प्रसन्ना, कुमारन थंगराजन और स्मृति वेंकट अहम भूमिकाओं में दिखेंगे। एंड्रयू लुइस निर्देशित सीरीज में लोकप्रिय अभिनेत्री लैला अहम भूमिका में दिखेंगी। साथ में संजना भी एक किरदार में नजर आएंगी। उनका यह डेब्यू है। एंड्रयू ने कहा- यह नोइर क्राइम थ्रिलर है और दर्शकों को अंदाजा लगाना मुश्किल होगा कि कहानी कहां जा रही है। स्क्रिप्ट से लेकर सीरीज के निर्देशन तक का पूरा सफर काफी रोमांचक रहा है। एसजे सूर्या, तमिल सिनेमा के चर्चित एक्टर-डायरेक्टर हैं। एंड्रयू ने सहायक निर्देशक के तौर पर सूर्या के साथ सात सालों तक काम किया है। सूर्या ने अपने ओटीटी डेब्यू को लेकर कहा कि जब पुष्कर-गायत्री ने मुझे सीरीज के लिए एप्रोच किया तो मैं बहुत खुश हुआ था। पहले भी पुलिस अफसर का किरदार निभा चुका हूं, लेकिन विवेक सामान्य किरदार नहीं है। सस्पेंस से भरी इस कहानी में दर्शक डूब जाएंगे।  अपने किरदार के बारे में लैला ने बताया कि मेरा किरदार काफी मजबूत है। हालांकि, यह एक ऐसी महिला का है, जो कमजोर है। मुश्किलों में रह रही यह महिला अपनी छोटी बेटी की हिफाजत की कोशिशों में जुटी रहती है। सीरीज में वेलोनी का टाइटल रोल संजना निभा रही हैं। संजना ने इस चुनौतीपूर्ण भूमिका के लिए लेखक-निर्देशक और निर्माताओं का शुक्रिया अदा किया, जिन्होंने संजना में भरोसा दिखाया। नवोदित एक्ट्रेस सीरीज को अपना ड्रीम डेब्यू मानती हैं।

 

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Action Hero – Trailer

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‘शमशेरा’ की असफलता में बॉलीवुड के लिए एक चेतावनी और सबक

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मुंबई,रणबीर कपूर-स्टारर शमशेरा हाल की हिंदी फिल्मों की एक लंबी सूची में नवीनतम प्रवेश है जिसमें सम्राट पृथ्वीराज, बच्चन पांडे, धाकड़ और जयेशभाई जोरदार शामिल हैं जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर खराब प्रदर्शन किया है। इस प्रवृत्ति ने फिल्म दर्शकों के साथ-साथ निर्माताओं के मन में भी कई सवाल खड़े किए हैं, और बिल्कुल सही है। क्या गलत हो रहा है? मुख्यधारा, व्यावसायिक हिंदी सिनेमा के साथ दर्शकों का बढ़ता मोह एक ऐसी घटना है जिसकी कुछ जांच की जरूरत है। जबकि हिंदी फिल्में बहुत अच्छा नहीं कर रही हैं, दक्षिण के उनके समकक्ष लोकप्रिय कल्पना को सफलतापूर्वक पकड़ने में कामयाब रहे हैं। समकालीन भारतीय फिल्म इतिहास में यह एक बड़ा क्षण है और हमने कभी भी भाषाई सीमाओं को पार करने वाली दक्षिणी फिल्मों के लिए इस तरह की सफलता नहीं देखी है। रजनीकांत शायद एकमात्र अपवाद थे, हालांकि उनकी फिल्में भी गैर-दक्षिणी भारतीय राज्यों में कुछ खास इलाकों में ही रिलीज हुईं। पुष्पा: द राइज, केजीएफ: चैप्टर 2, और आरआरआर जैसी फिल्मों का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन हिंदी सिनेमा हार्टलैंड में उल्लेखनीय है। हाल ही में, पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों से यात्रा करते हुए, मैंने देखा कि पुष्पा गाँव की दुकानों में  अभिनेता अल्लू अर्जुन के चेहरे की शर्ट और टी-शर्ट। थोड़ी देर बाद, मुझे गाँव के जंक्शन पर युवाओं का एक समूह गर्व से बाहुबली का प्रदर्शन करते हुए मिला। वो भी उस जगह पर जहां बोली जाने और सुनी जाने वाली एकमात्र भाषा बांग्ला की बोली है। यह एक दशक पहले भी अकल्पनीय था और इन फिल्मों ने जिस महत्वपूर्ण पैठ को हासिल किया है, उसकी ओर इशारा करता है। डिजिटल प्रौद्योगिकी और इसके प्रसार ने इस पहुंच में निर्विवाद रूप से योगदान दिया है। लेकिन यह हिंदी सिनेमा के सुपरस्टारडम और फैनबेस के बारे में हमारी पूर्वकल्पित धारणाओं पर भी सवाल खड़ा करता है। क्या वे प्रशंसक अब नए चरागाहों में चले गए हैं? क्या वे अपने पसंदीदा सितारों से एक ही तरह की फिल्में बार-बार करने से थक चुके हैं? क्या यह एक तरह की चेतावनी है कि हिंदी सिनेमा के अलावा भी स्वस्थ मनोरंजन के और भी रास्ते हैं जो अब आसानी से उपलब्ध हैं और उपलब्ध हैं? ये दक्षिण भारतीय फिल्में बड़े पर्दे की असाधारण फिल्में हैं। दर्शक इन फिल्मों को एक तमाशे की उम्मीद में देखने जाते हैं। जब बाहुबली: द बिगिनिंग रिलीज़ हुई, तो कुछ ने इसकी तुलना जेम्स कैमरून के अवतार से भी कर दी। इन फिल्मों की सामग्री एक अलग चर्चा के योग्य है और यह कितना प्रतिगामी हो सकता है, इसके बारे में बहुत कुछ लिखा और कहा गया है। अयान मुखर्जी की आगामी ब्रह्मास्त्र के बारे में भी चर्चा है, जो इस साल कई बार देरी से रिलीज होने के बाद, इन बड़ी दक्षिणी फिल्मों के लुक और फील की नकल कर रही है। क्या यह समान लाभांश लाएगा? हमें इंतजार करना चाहिए और देखना चाहिए लेकिन एक खाका निश्चित रूप से बनाया गया है। हालांकि, यह एक बड़ी समस्या को इंगित करता है: मौलिकता या रचनात्मक सोच की कमी। क्या हिंदी मुख्यधारा का उद्योग सामग्री के लिए इतना कठिन है कि उन्हें दक्षिण के एक फॉर्मूले पर भरोसा करना चाहिए? हिंदी सिनेमा की कुछ अन्य बड़ी बॉक्स ऑफिस सफलताएं जैसे अत्यधिक समस्याग्रस्त कबीर सिंह भी दक्षिणी फिल्मों की रीमेक हैं। तेलुगु सुपरस्टार विजय देवरकोंडा, अर्जुन रेड्डी में मुख्य भूमिका, जिस पर कबीर सिंह आधारित थी, अब करण जौहर द्वारा आगामी हिंदी फिल्म लिगर में लॉन्च की जा रही है, शायद दक्षिण में स्टार के विशाल प्रशंसक आधार को भुनाने के लिए भी। एक अन्य नोट पर, महामारी के दौरान, दर्शकों ने ओटीटी प्लेटफार्मों के माध्यम से समकालीन मलयालम सिनेमा की खोज की। ये फिल्में अब कई फिल्मी प्रवचनों की आधारशिला हैं। वे वाणिज्य और सामग्री के बीच एक अद्भुत संतुलन बनाने में सफल रहे हैं, जिसमें मुख्यधारा का हिंदी सिनेमा काफी हद तक विफल रहा है। मलिक, भीष्म पर्व, डियर फ्रेंड, कुरुप, सैल्यूट, मिन्नल मुरली जैसी फिल्में नॉन-मेनस्ट्रीम नहीं हैं। टोविनो थॉमस और फहद फासिल जैसे सफल मलयालम सितारों के पास न केवल प्रदर्शित करने के लिए दिलचस्प फिल्मोग्राफी हैं, बल्कि निर्माता के रूप में इसी तरह की रोमांचक फिल्म परियोजनाओं का भी समर्थन किया है। ट्रेंड को फॉलो करने की बजाय खुद ट्रेंड बना रहे हैं| 
कहानियों के संदर्भ में इन फिल्मों की ताजगी और उनके द्वारा दिखाए जाने वाले चरित्र उन्हें अलग बनाते हैं। ओटीटी प्लेटफार्मों के माध्यम से ऐसे सिनेमा तक पहुंच ने दर्शकों को यह भी बताया है कि अच्छे सिनेमा के लिए बड़े बजट की आवश्यकता नहीं होती है और इसे सीमित साधनों के साथ बनाया जा सकता है। जब उनके घर के आराम में बेहतर फिल्में उपलब्ध हैं तो उन्हें किसी भी कम के लिए समझौता क्यों करना चाहिए? आखिरकार, एक फिल्म देखने वाले के लिए अच्छा सिनेमा देखना सबसे अच्छा एक्सपोजर होता है।

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