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देश

‘गांधी मोदी के लिए मजबूरी का नाम’ (मोदी सरकार : 1 साल)

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नई दिल्ली| गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले आम चुनाव के दौरान जिन नारों की दुहाई देकर देश की सत्ता पर कब्जा जमाया, सत्ता में आने के बाद वे नारे अब दरकिनार कर दिए गए हैं। चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान सरदार पटेल मोदी के आराध्य थे। अब ‘गांधी का चश्मा’ उनकी सरकार का सिंबल बन गया है। (pm narendra modi news in hindi) देश-दुनिया में हर जगह वह गांधी की चर्चा करना नहीं भूलते।

यह अपने आप में अहम सवाल है। सवाल यह भी है कि गांधी विरोधी विचारधारा के बल पर गुजरात में तीन कार्यकाल तक गद्दी संभालने के बाद अब गांधी की माला जपने की मोदी की ऐसी क्या मजबूरी हो गई? और यह भी कि क्या गांधी को उन्होंने वाकई गांठ लिया है?

ये सवाल महत्वपूर्ण इसलिए भी हैं, क्योंकि मोदी की सत्ता का साल पूरा हो गया है। इस दौरान गांधी के चश्मे से उन्होंने कुछ देखा भी है क्या?

राष्ट्रीय राजधानी स्थित गांधी स्मारक निधि के मंत्री, वयोवृद्ध गांधीवादी रामचंद्र राही मोदी के इस गांधी प्रेम को खारिज कर देते हैं। राही कहते हैं कि मोदी ने गांधी का चश्मा जरूर चुरा लिया है, लेकिन गांधी से उनका कोई लेना-देना नहीं है।

राही ने आईएएनएस से कहा, “दरअसल, नाम वही लिया जाता है, जिससे कुछ पुण्य मिले। (महात्मा) गांधी के अलावा आखिर कौन-सा ऐसा नाम है, जिसे प्रधानमंत्री के रूप में मोदी देश के बाहर ले सकते हैं?”

राही ने कहा कि मोदी ने गुजरात में जिस तरीके से शासन किया, उनके लिए उस तरह से देश पर शासन कर पाना संभव नहीं है। उन्होंने कहा, “गुजरात दंगे के कारण मोदी की छवि दुनियाभर में बिगड़ी है। अपनी छवि सुधारने के लिए गांधी का नाम लेना उनकी मजबूरी बन गई है।”

राही ने आगे कहा, “लेकिन मोदी की नीतियां गांधी विरोधी हैं। मेक इन इंडिया का गांधी के स्वदेशी-मंत्र से कोई लेना-देना नहीं है। करेंसी आधारित अर्थव्यवस्था से देश मजबूत नहीं होगा, उत्पादक की मजबूती से देश मजबूत होगा। देश को मेक इन इंडिया नहीं, मेड ऑफ इंडिया चाहिए।”

गांधीवादी विचारक कुमार प्रशांत, राही का समर्थन करते हैं। वह कहते हैं, “वैसे तो मोदी को गांधी की कसौटी पर कसना ही गलत है, लेकिन चूंकि वह गांधी के प्रतीकों और उनके नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं, लिहाजा गांधी के चश्मे से उन्हें तौला जाना लाजिमी भी है।”

गौरतलब है कि मोदी इस दौरान देश में और देश से बाहर जहां भी गए हैं, उन्होंने गांधी का बखान किया है। सत्ता संभालने के बाद 15 अगस्त के अपने संबोधन में उन्होंने गांधी के नाम पर स्वच्छ भारत अभियान की घोषणा की। गांधी के चश्मे को इसका प्रतीक बनाया।

प्रशांत ने कहा, “गांधी जिस कारण आज जिंदा हैं, और आगे भी जिंदा रहेंगे, वह इसलिए कि उन्होंने नए प्रतिमान गढ़े, नई परंपराएं स्थापित कीं। लेकिन मोदी आज उन परंपराओं को ध्वस्त कर खड़े हुए हैं।”

प्रशांत ने कहा, “गांधी का नाम तो वह इसलिए लेते हैं, क्योंकि यह सिक्का पुराना होने के बाद भी देश के बाहर तेजी से चलता है। देश के प्रतिनिधि होने के नाते भी मोदी गांधी का नाम लेते हैं। यह उनकी एक चालाकी भरी मजबूरी है।”

महात्मा गांधी द्वारा अहमदाबाद में 1920 में स्थापित गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलनायक (कुलपति) सुदर्शन अयंगर कहते हैं, “मोदी जबतक गुजरात में थे, तबतक उन्होंने सरदार पटेल को महिमामंडित करने की कोशिश की। आरएसएस की विचारधारा को आगे बढ़ाया, चिमनभाई पटेल की यादें ताजा कर दी। लेकिन राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सरदार उनके लिए छोटे पड़ गए। अब उन्हें गांधी जैसे लंबे कद वाले व्यक्ति की जरूरत है।”

अयंगर ने आईएएनएस से कहा, “लेकिन मोदी को गांधी के विकेंद्रित, पर्यावरण अनुकूल अर्थव्यवस्था से कोई मतलब नहीं है। उनके लिए सबकुछ बाजार है। मोदी सबकुछ अपनी मुट्ठी में रखना चाहते हैं। नीति आयोग इसका एक नमूना है। यही गुजरात मॉडल भी है, जिसे वह पूरे देश पर थोपना चाहते हैं।”

मोदी ने केंद्र में सत्ता संभालने के बाद देश के विकास में प्रमुख भूमिका निभा रहे योजना आयोग को समाप्त कर उसके स्थान पर नीति (राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान) आयोग की स्थापना की।

दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान से प्रकाशित प्रतिष्ठित पत्रिका, गांधी मार्ग के संपादक अनुपम मिश्र के विचार अलहदा हैं। उन्होंने कहा, “लोकतंत्र के छोटे-छोटे घरौदों में पल-बढ़ कर बाहर निकले लोग अधिक विस्तार पाने के बाद भी अक्सर अपने पुराने घरों, परिवारों को नहीं भुला पाते। उस परिवार से जुड़े रहने की उनकी मजबूरी भी होगी। लेकिन जब वे अपने यहां से निकलकर बाहर बड़े मंचों पर जाते हैं तो वे उद्दात्त विचार को ही ले जाते हैं। ऐसा न करने पर वे अप्रासंगिक जो हो जाएंगे।”

राष्ट्रीय गांधी स्मारक निधि के उपाध्यक्ष अनुपम ने किसी संगठन, या व्यक्ति का नाम लिए बगैर कहा, “आज जो नितांत संकीर्ण विचारधारा और हिंसा से भरे संगठन हैं, उनका आतंक जरूरत व्याप्त है, लेकिन उनकी कोई मान्यता नहीं है। किसी (मोदी) के लिए गांधी का नाम लेने के पीछे यह भी एक संकेत हो सकता है।”

अनुपम ने आगे कहा, “सर्वसम्मति उदार, उद्दात्त विचारों को ही मिलती है। रचनात्मकता संकीर्ण विचारों से नहीं होती।”

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असम-मेघालय बॉर्डर पर हिंसा, फायरिंग में अब तक 6 लोगों की मौत; 7 जिलों में इंटरनेट सेवा बंद

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गुवाहाटी। असम-मेघालय सीमा पर लकड़ी की तस्करी को रोके जाने के दौरान मंगलवार तड़के हिंसा भड़क गई। हिंसा में वन रक्षक समेत 6 लोगों की मौत हो गई। अधिकारियों ने बताया कि असम-मेघालय सीमा पर पुलिस ने अवैध लकड़ी के ट्रक को रोका था, जिसके बाद हिंसा भड़क गई। एहतियात के तौरे पर 7 जिलों में इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई है।

वन रक्षकों ने तीन लोगों को पकड़ा

पश्चिम कार्बी आंगलोंग के पुलिस अधीक्षक इमदाद अली ने इसकी जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि असम वन विभाग ने मेघालय सीमा पर ट्रक को रोका था। ट्रक चालक ने भागने की कोशिश की। उसे रोकने के लिए वन रक्षकों ने फायरिंग कर दी। अधिकारी ने आगे बताया कि फायरिंग में ट्रक का टायर पंचर हो गया। वन रक्षकों ने ट्रक चालक समेत तीन लोगों को पकड़ लिया, हालांकि अन्य भागने में कामयाब रहे।

हथियार समेत पहुंची भीड़

अधिकारी ने बताया कि घटना के बारे में नजदीकी पुलिस थाना में जानकारी दी गई और अतिरिक्त पुलिस बल की मांग की। सुबह पांच बजे पुलिस के पहुंचते ही कुछ स्थानीय लोग हाथों में हथियार लिए वहां पहुंच गए। भीड़ ने तस्करों को छोड़े जाने की मांग को लेकर वन रक्षकों और पुलिस को घेर लिया। बचाव में भीड़ पर गोली चलानी पड़ी।

वन रक्षक समेत 6 लोगों की मौत

गोलीबारी में वन रक्षक की मौत हो गई। उसके अलावा मेघालय के पांच लोगों की भी मौत हुई है। हिंसा में घायल हुए लोगों को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है। वन रक्षक की मौत की वजह का पता नहीं चल सका है। इस घटना की जांच शुरू कर दी गई है।

7 जिलों में इंटरनेट सेवा बंद

उधर, एहतियात के तौर पर मेघालय के सात जिलों में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई हैं। सीएम कोनराड संगमा ने बताया कि मामले में मेघालय पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है।

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उत्तर प्रदेश

पूर्व मंत्री बालेश्वर त्यागी ने मेयर चुनाव की दावेदारी से किया इंकार

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कहा पार्टी मेरे नाम पर करेगी विचार तो भी मैं चुनाव के लिए नहीं तैयार
वरिष्ठ संवाददाता (करंट क्राइम)
गाजियाबाद। पूर्व मंत्री बालेश्वर त्यागी अक्सर अपनी बेबाक राय के लिए जाने जाते हैं। वो शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली में खामी को खुलकर लिखते हैं। कई बार अपने कार्यकाल के संस्मरण भी लिखते हैं और कई बार वो अपने शब्दों से मौजूदा निजाम को आईना भी दिखाते हैं। बालेश्वर त्यागी उत्तर प्रदेश सरकार में गृह राज्यमंत्री, व्यापार कर मंत्री और बेसिक शिक्षा मंत्री रहे हैं। एक लम्बे समय से वो भाजपा की राजनीति में अपने लिए नयी जिम्मेदारी और नयी पारी का इंतजार कर रहे हैं लेकिन अब पता चला है कि बारी का इंतजार खत्म हो गया है और बालेश्वर त्यागी जनप्रतिनिधि वाली कोई चुनावी पारी नहीं खेलना चाहते। सियासी गलियारों में ये चर्चा उठी थी कि पूर्व मंत्री बालेश्वर त्यागी भी मेयर टिकट के लिए दावेदारी में हैं। उन्होंने अपनी कई पोस्ट में निगम की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाये थे। यहीं से उनकी निगम मेयर दावेदारी की बात चली। करंट क्राइम ने इस मामले में पूर्व मंत्री बालेश्वर त्यागी से बात की और उन्हीं से पूछा कि क्या आप मेयर टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। यहां पर बालेश्वर त्यागी ने कहा कि मेरा कोई विचार नहीं है और कोई दावेदारी नहीं है। उन्होंने कहा कि अब आयु 74 वर्ष हो चुकी है और चीजें समय के साथ होती हैं। जब उनसे पूछा गया कि यदि पार्टी आपके नाम पर विचार करती है तो क्या आप मेयर चुनाव लड़ेंगे। यहां पूर्व मंत्री बालेश्वर त्यागी ने कहा कि यदि पार्टी मेरे नाम पर ही विचार करेगी तो भी मैं तैयार नही हूं। 56 वर्ष की आयु में मैं चुनाव हार गया और अब 74 वर्ष की आयु है। पार्टी ने तब मौका नहीं दिया और अब उम्र इस पद के लिहाज से भागदौड़ की नही है।

मैंने तेलूराम काम्बोज को दी थी चुनाव न लड़ने की सलाह
मैंने तेलूराम को समझाया भी था और चुनाव लड़वाया भी था उम्र के हवाले से अब बालेश्वर त्यागी मेयर चुनाव की दावेदारी भी नहीं करना चाहते। उन्होंने कहा कि निगम में ना तो पार्टी का कोई मामला होता है और ना ही पार्षद पार्टी गाईड लाईन को मानते हैं और ना ही अनुशासन को मानते हैं। विधानसभा में विधायकों पर अनुशासन की नीति होती है और उन्हें पार्टी का निर्णय मानना पड़ता है। लेकिन निगम में पार्षद ही पार्षद की बात कई बार नहीं मानते। मैंने तेलूराम काम्बोज को समझाया था कि मेयर चुनाव मत लड़ो, आयु का तकाजा है। लेकिन एक भाजपा कार्यकर्ता की तरह मैंने उनकी पैरोकारी भी की और उन्हें चुनाव भी लड़वाया। लेकिन समझाया भी था कि 75 की उम्र में कई चीजों को बदला नहीं जा सकता है।

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दिल्ली

मैं कड़ी मेहनत करता हूं और काम करके दिखाता हूं: पीएम मोदी

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुरेंद्रनगर में सार्वजनिक बैठक शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने अभिभाषण भी दिया। मैंने कहा कि नर्मदा योजना का सबसे बड़ा लाभ किसी भी जिले को मिलेगा, सुरेंद्रनगर जिले को मिलेगा और आज वह लाभ आप तक पहुंच गया है।
पीएम मोदी नो कहा कि मैं जानता हूं कि गुजरात में घर-घर 24 घंटे बिजली पहुंचाना एक कठिन काम है, लेकिन मुझे कड़ी मेहनत करनी पड़ी है। मैं कड़ी मेहनत करता हूं और
काम करके दिखाता हूं।
पीएम मोदी ने कहा कि हमारा सुरेंद्रनगर जिला नमक बनाने में एक है। भारत के 80% नमक का उत्पादन गुजरात में होता है। इससे लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। पहले के जमाने में गुजरात में उच्च शिक्षा के लिए दूसरे राज्य जाना पड़ता था, आज दूसरे राज्यों के युवा गुजरात की धरती पर पढ़ने आते हैं।
मैं वार महोत्सव में अपमान को निगलता हूं क्योंकि मैं इस देश के 130 करोड़ लोगों का भला करना चाहता हूं, मैं इस भारत को एक विकसित भारत बनाना चाहता हूं।

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