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जनतंत्र सामूहिक प्रीति रीति

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जनतंत्र सामूहिक प्रीति रीति है। मनुष्य की सामासिक योजकता।(democracy collective hindi news) हरेक मनुष्य अद्वितीय है। अनूठा। उस जैसा दूसरा नहीं। अप्रतिम और अतुलनीय। भिन्न विचार, भिन्न विश्वास और भिन्न भिन्न भाषा बोली। सबके रूप, रंग, छन्द भिन्न भिन्न हैं। निवास की दृष्टि से भूक्षेत्र और परिस्थितियां भी भिन्न भिन्न हैं। लेकिन परस्पर प्रीति सनातन भारतीय प्यास है।

भारतीय स्वप्न है कि सब अपने रस, छंद और लय में जिएं, लेकिन सबके मन समान हों। सबका प्रकाश एक साथ चमके। सभा ऐसी ही संस्था है। सभा में ‘स’ सहित का सूचक है और ‘भा’ प्रकाशवाची है ही। म्यांमार, नैपाल और चीन जैसे पड़ोसी भूखण्ड जनतंत्री नहीं हो सके। भारत दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र हो गया। पाकिस्तान और बांग्लादेश भारतीय संस्कृति से जुड़े होकर भी प्राचीन जनतंत्री भावभूमि नहीं अपना सके।

समाजशास्त्रियों, बुद्धिजीवियों और राजनेताओं के लिए यह विषय महत्वपूर्ण चुनौती है। प्रश्न बड़ा है। आखिरकार तमाम विविधताओं के बावजूद भारत क्यों जनतंत्री है? और पड़ोसी देशों में प्रीतिपूर्ण जनतंत्र का विकास क्यों नहीं हो पाया? भारतीय चिन्तन की मूल भूमि लोकतंत्र है। लोक और जन वैदिक पूर्वजों के प्रियतम विचार रहे हैं।

लोक बड़ा है। आयतन में असीम लेकिन विश्वास में हृदयग्राही। लोक प्रकाशवाची है। भारतीय चिंतन में लोक एक नहीं अनेक हैं। यजुर्वेद के अंतिम अध्याय में कई लोकों का उल्लेख है, ‘असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता: – असुरों के अनेक लोक हैं। वे अंधकार से आच्छादित हैं। आत्मविरोधी इन्हीं में बारंबार जाते हैं।’ यहां अज्ञान अंधकार आच्छादित लोक का वर्णन है। इसके पहले ऋग्वेद के पुरूष सूक्त में भी कई लोकों का उल्लेख है। यहां ‘पुरुष’ संपूर्णता का पर्याय है।

कहते हैं, “यह विश्व उस पुरुष की महिमा है। झलक मात्र है। पुरुष इससे बड़ा है। विश्व उसका एक भाग (पाद) है। तीन भाग अमृत लोक में हैं।”

जान पड़ता है कि अमृतलोक का आयतन इस विश्व से तीन गुना बड़ा है। जो भी हो ‘लोकों’ की धारणा वैदिक काल से ही गतिशील नदी की तरह समूचे जनजीवन में जस की तस बह रही है। मृत्यु की सूचना के बाद शोकग्रस्त लोग मृत्युलोक, पितरलोक, स्वर्गलोक आदि की चर्चा करते हैं।

यहां सामान्य चर्चा में भी ‘लोक’ आ जाता है। यह ‘लोक’ शास्त्र का भी अतिक्रमण करता है। कर्मकांड की तमाम विधियों में शास्त्रीय रीति को काटने वाले लोग नई रीति को लोकरीति कहते हैं। इस अर्थ में लोक का अर्थ सामान्यजन होता है। शास्त्रीय गीत और संगीत की जगह लोकगीत या लोकसंगीत ऐसी ही प्रिय धारणाएं हैं।

लोक का अर्थ केवल मनुष्य नहीं। जन का अर्थ केवल एक मनुष्य नहीं। जन-समूह ही है। ऋग्वेद सहित समूचे वैदिक साहित्य में लोक का अर्थ जन से बड़ा है। जन की महत्ता भी कम नहीं। ऋग्वेद के अदिति देव का विस्तार बताते हुए ऋषि ने ‘अदिति पंचजना : – अदिति 5 जन’ का शब्द प्रयोग किया है। ऐतरेय उपनिषद् ऋग्वेद संबंधी है। यहां ‘आत्मा’ को सृष्टि सृजन का कर्ता बताया गया है।

इस उपनिषद् के प्रारंभ में कहते हैं कि आदि में आत्मा अकेला था, दूसरा कोई नहीं था – आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत। नान्यत्किंचनमिषत। उसने लोकसृजन की इच्छा की – स ईक्षत लोकन्नु सृजा इति। उसने लोक बनाए – स इमांलोकन्नु सृजत। उसने द्युलोक और ऊपर के लोक, जल के नीचे के लोक, स्वर्ग लोक और उसके ऊपर के लोक बनाए। यहां भी अनेक लोकों का उल्लेख है।

उसने लोकपाल भी बनाए और सबके लिए अन्न भी – अन्नामेभ्य: सृजा इति। यहां आत्मा के द्वारा लोक बनाने को अलग कर दे तो सृष्टि का विकासवादी सिद्धांत स्पष्ट हो जाता है। लोक अनेक हैं। तुलसी की कथा के गरुड़ – कागभुशुण्डि संवाद में भी अनेक लोक हैं। वैज्ञानिक अनेक सौर परिवारों की बाते कर रहे हैं। ऋग्वेद में सूर्य लोक और चंद्र लोक हैं ही। जन से लोक बड़े हैं। तब जनतंत्र से लोकतंत्र भी बड़ा और व्यापक होना चाहिए।

विश्व एक व्यवस्था है। सुंदर, अच्छी, बुरी, अनुशासित या अराजक? जैसी भी। कैसी भी। व्यवस्था तो है ही। आदि मानव ने परिस्थितिवश अपने समुदाय बनाए। समुदायों ने आंतरिक अनुशासन गढ़े। आत्म-अनुशासन के बावजूद उजड्ड लोग अपनी राह चले। इसी परिस्थिति में राजा या राजव्यवस्था का जन्म हुआ। भारत में समूह या समुदाय की सबसे सुंदर इकाई थी परिवार। बहुत छोटी लेकिन सर्वांग सुंदरी। परिवार स्वाभाविक इकाई है। इसके बाद की इकाइयां परिस्थितिवश अस्तित्व में आईं। बाद में इकाइयों में परिवार भाव के विकास की प्यास निरंतर बनी रही।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भारतीय आकांक्षा में भी यही प्यास है। भारत में परिवार के बाद सबसे छोटी इकाई बनी गण। गण वस्तुत: अंत: संगठित समूह थे। गण के नेता गणपति, गण अध्यक्ष आदि कहे गए और आस्था में गणेश भी। गणेश संभवत: इसीलिए सभी पूजनीयों में प्रथम हैं और सभी देवों में अग्रगण्य भी। गण समूह सांस्कृतिक आर्थिक और अन्य कारणों से आपस में मिलते गये। गणों से मिलकर बड़ी इकाई बनी ‘जन’। भारतीय राष्ट्रगान में जन के साथ गण भी हैं और जनगण का सामूहिक मन ही जनगणमन है। जनगणमन की सामूहिकता ही जनतंत्र है।

जनतंत्र मानव समाज की आंतरिक एकता है। यह आंतरिक एकता अर्जित करनी होती है। लोकतंत्र स्वाभाविकता है। हम प्रकृति के अंग हैं, पृथ्वी के अंग हैं, जल, अग्नि, वायु और आकाश के अंग हैं। परिवार के अंग हैं और समाज के भी अंग हैं। किसी राजनैतिक दल के सदस्य होने के कारण दल के भी अंग हैं। समिति या अन्य संस्थाओं के भी अंग होते हैं। मनुष्य सोचता है।

हम सब चिंतनशील प्राणी हैं। पशु और वनस्पतियां भी प्राण ऊर्जा से भरी पूरी हैं। वे भी चिंतनशील हैं। जनतंत्र की सफलता के लिए सबके प्रति अपने दायित्व का चिंतन जरूरी है। पश्चिम के जनतंत्र और भारतीय जनतंत्र में यही मौलिक अंतर है। वे केवल मनुष्य के बारे में सोचते हैं।

भारत मंे सृष्टि के सभी अवयवों पर समग्र विचार की परंपरा है। यहां जन के साथ लोक का भी विचार चलता है। पश्चिम का जनतंत्र राजतंत्र की प्रतिक्रिया है। भारतीय जनतंत्र हमारे रस, रक्त प्रवाह का हिस्सा है। यहां का जन लोक से रस लेता है। लोक को सींचता है, स्वयं भी रससिक्त है। लोक प्रीतिकर है, जन प्रीति इसी अनुभूति का अनुषंग है। जनतंत्र लोकतंत्र का पुत्र है।

लोकतंत्र में सूर्य चंद्र नदी, पर्वत, कीट, पतिंग, वनस्पति, पशु और मनुष्य भी सम्मिलित हैं। क्या हम तमाम लोकों का अस्तित्व स्वीकार कर सकते हैं? चिंतन की अल्प अवधि के लिए ऐसा सोचना बुरा नहीं। तब प्रश्न उठता है कि लोक अनेक हैं तो क्या सभी लोक स्वतंत्र इकाई हैं। लेकिन ऐसा असंभव है। प्रकृति एक अखण्ड सत्ता है। लोक इसी प्रकृति का ही भाग हैं। ऋग्वेद का पुरुष भी ऐसी ही अखण्ड सत्ता है। सबके भीतर है, सबको आच्छादित करता है। स्पष्ट है कि सारे लोक भी परस्पर जुड़े हुए हैं। पृथ्वी को लोक जानें तो यह जल के नीचे पाताल लोक से जुड़ी हुई है।

पाताल की बढ़ी ऊष्मा से ही धरती कांपती है और भूकंप आते हैं। द्युलोक भी पृथ्वी से संबंधित है। सारे लोक परस्परावलंबन में हैं। मनुष्य और सभी जड़ व चेतन भी। तब इनके भीतर संगति, समन्वय, प्रीति और अनेकता के अंतरंग में एकता की लय भी होनी चाहिए। इसी अंत: एकता की वीणा के सभी तारों की सुर संगति का नाम लोकतंत्र है। लोकतंत्र नमस्कारों के योग्य है और उसका पुत्र जनतंत्र भी।

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गर्दन का दर्द: डॉक्टर बताते हैं प्रकार, कारण

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गर्दन का दर्द आराम और गतिविधि में बदलाव के साथ अपने आप हल हो सकता है लेकिन कभी-कभी गर्दन का दर्द अधिक गंभीर विकृति से जुड़ा हो सकता है और इसके लिए विशेष प्रबंधन की आवश्यकता हो सकती है। डॉक्टर इसके प्रकार, कारण, लक्षण, उपचार, बचाव के उपाय बताते हैं।गर्दन का दर्द एक बहुत ही सामान्य मस्कुलोस्केलेटल डिसऑर्डर है जो साल में कम से कम एक बार हर तीन लोगों में से एक को प्रभावित करता है। यह हल्का या गंभीर हो सकता है और हमारे कंधों, बाहों में फैल सकता है और इससे सिरदर्द भी हो सकता है। गर्दन का दर्द या बेचैनी एक बहुक्रियात्मक बीमारी है और इसके परिणामस्वरूप उत्पादकता और दक्षता में कमी आ सकती है लेकिन एक स्वस्थ जीवन शैली जिसमें नियमित शारीरिक व्यायाम, संतुलित आहार और एक 
अच्छा कार्य-जीवन संतुलन शामिल है, गर्दन के दर्द को दूर रख सकता है।

प्रकार:1. ओसीसीपिटल न्यूराल्जिया - यह एक प्रकार का सिरदर्द है जिसमें गर्दन के ऊपरी हिस्से, सिर के पिछले हिस्से और कान के पीछे के हिस्से में दर्द होता है। ओसीसीपिटल नसें, जो खोपड़ी से गुजरती हैं, सूजन या घायल हो सकती हैं, जो ओसीसीपिटल न्यूराल्जिया का कारण बनती हैं।
2. सरवाइकल रेडिकुलोपैथी - इसे कभी-कभी पिंच नर्व के रूप में जाना जाता है, जो आमतौर पर गर्दन में डिस्क हर्नियेशन से विकसित होती है। इससे गर्दन, कंधे, हाथ और उंगलियों में असहनीय दर्द हो सकता है। यह सबसे दर्दनाक गर्दन की स्थिति में से एक है, और शुक्र है कि एक अच्छा पूर्वानुमान भी है।
3. पहलू आर्थ्रोपैथी - इस शब्द का अर्थ है गर्दन के छोटे कशेरुक जोड़ों का गठिया, और यह गर्दन के दर्द का एक प्रसिद्ध कारण है। यह उम्र बढ़ने या रुमेटीइड गठिया जैसी स्थितियों के कारण हो सकता है।
4. मायोफेशियल दर्द सिंड्रोम - मायोफेशियल दर्द सिंड्रोम एक पुरानी दर्द की स्थिति है जो गर्दन की मांसपेशियों और प्रावरणी को प्रभावित करती है। पीठ के निचले हिस्से और ऊपरी हिस्से, गर्दन, कंधे और छाती शरीर के उन हिस्सों में से हैं जहां मायोफेशियल दर्द सिंड्रोम प्रकट हो सकता है। यह दोहराए जाने वाले गतियों द्वारा लाया जा सकता है जो लोग काम पर करते हैं, तनाव से संबंधित मांसपेशियों में तनाव, मांसपेशियों में चोट, खराब मुद्रा, या मांसपेशी समूह निष्क्रियता।
5. सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस - सर्वाइकल स्पाइन में उम्र से संबंधित टूट-फूट के कारण गर्दन में तकलीफ और अकड़न होती है, जिसे सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस कहा जाता है।6. व्हिपलैश नेक मोच - यह आपकी गर्दन पर तेज आघात, दुर्घटना, कार दुर्घटना आदि के कारण होता है।
7. फाइब्रोमायल्गिया - यह व्यापक मस्कुलोस्केलेटल दर्द की विशेषता है जो नींद, स्मृति और मनोदशा में गड़बड़ी से जुड़ा हो सकता है। ज्यादातर लोगों को गर्दन और पीठ में तेज दर्द और अकड़न का अनुभव होता है।

कारण:नई दिल्ली के वसंत कुंज में द इंडियन स्पाइनल इंजरीज सेंटर के दर्द प्रबंधन चिकित्सक डॉ विवेक लूंबा ने कुछ सामान्य कारणों की ओर इशारा किया, जिसके परिणामस्वरूप गर्दन में दर्द होता है:
1. शारीरिक तनाव - यह गर्दन के दर्द का सबसे आम कारण है, जो भारी शारीरिक व्यायाम, भारोत्तोलन, कंधे पर भारी बैग ले जाने, लंबी दूरी की ड्राइविंग / यात्रा आदि जैसी गतिविधियों में गर्दन की मांसपेशियों के अति प्रयोग के परिणामस्वरूप होता है। ऐसी सभी गतिविधियों का कारण हो सकता है गर्दन में मोच आने के कारण गर्दन का दर्द द्वितीयक होता है। कभी-कभी इसका परिणाम डिस्क हर्नियेशन हो सकता है, जिससे गर्दन का दर्द बांह के नीचे विकीर्ण हो सकता है।
2. आसन - खराब मुद्रा गर्दन दर्द के प्रमुख कारणों में से एक है। स्मार्टफोन और लैपटॉप (टेक्स्ट नेक सिंड्रोम) का उपयोग करते समय धनुषाकार पीठ और आगे की ओर झुकी हुई गर्दन के साथ लंबे समय तक बैठने से सर्वाइकल स्पाइन पर तनाव बढ़ जाता है, जिससे सर्वाइकल डिजनरेशन, कठोरता और दर्द होता है। लूंबा का कहना है कि स्कूल जाने वाले बच्चों में इन लक्षणों के साथ उनके क्लिनिक में आने की संख्या लगातार बढ़ रही है। उनका मानना ​​​​है कि महामारी ने समस्या को और खराब कर दिया है। 
3. व्हिपलैश चोट - वाहन दुर्घटनाओं में अचानक झटकेदार गर्दन की गति के परिणामस्वरूप व्हिपलैश चोट लग सकती है, जिससे गर्दन में दर्द हो सकता है।
4. गठिया - गर्दन के कशेरुक जोड़ों के गठिया के परिणामस्वरूप गर्दन में दर्द हो सकता है। 
5. विविध - गर्दन का दर्द अन्य कारणों से हो सकता है जैसे चिंता, अवसाद, संक्रमण, ट्यूमर आदि।

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देश

अधिकांश भारतीय अपने खर्च प्रबंधन में कठिनाई का सामना कर रहे : सर्वे

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नई दिल्ली| अधिकांश भारतीयों को अपने खर्चो का प्रबंधन करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। आईएएनएस-सी वोटर सर्वेक्षण में यह बात सामने आई। सर्वेक्षण में लगभग 65.8 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि वर्तमान खर्चो को प्रबंधन करना मुश्किल हो गया है, जबकि 30 प्रतिशत लोगों ने कहा कि खर्च तो बढ़ गए हैं, लेकिन वे प्रबंधन योग्य हैं।

उत्तरदाताओं में से 2.1 प्रतिशत ने कहा कि पिछले एक साल में उनके खर्च में कमी आई है और अन्य 2.1 प्रतिशत मामले पर प्रतिक्रिया नहीं दे सके।

सर्वेक्षण से यह भी पता चला कि व्यवसायों और लोगों की कमाई पर महामारी के व्यापक प्रभाव के साथ, पिछले एक साल में अधिकांश भारतीयों की क्रय शक्ति कमजोर हो गई।

आम आदमी की कमाई पर पड़ने वाले प्रभाव के साथ-साथ लोगों पर भी इसका असर पड़ा है।

2020 में अधिकतर समय, खाद्य सामग्री और ईंधन की कीमतों में वृद्धि की वजह से मुद्रास्फीति उच्च स्तर पर बनी रही।

मुद्रास्फीति संबंधी चिंताओं के वजह से ही भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भी महामारी के प्रारंभिक चरण के दौरान तेज कटौती के बाद उधार दरों को बरकरार रखा।

सर्वेक्षण में यह भी पता चला है कि पिछले एक साल में 70 प्रतिशत से अधिक लोगों ने वस्तुओं के बढ़े हुए मूल्य के प्रतिकूल प्रभाव को महसूस किया।

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नई नौकरी पर जा रहे हैं तो रखें इन बातों का ध्यान

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अगर आप पढ़ाई के बाद पहली बार नई जगह नौकरी पर जा रहे हैं या नौकरी बदल कर पहली बार ऑफिस जा रहे हैं तो आपको कई बातों का ध्यान रखना होगा। अगर आप ऑफिस के शुरुआती दिनों में इन बातों का ध्यान रखेंगे तो आपको नई जगह पर तालमेल बैठाने में आसानी होगी।
कॉलेज और ऑफिस में अंतर होता है। यह जान लें कि ऑफिस में लोग एक डेकोरम का पालन करते हैं। उनके खाने और चाय पीने का वक्त तय होता है। कुछ हद तक काम के लिए समय सीमा भी तय होती है। इसलिए पहले जॉब में खुद को साबित करने के लिए यह जरूरी है कि पहले आप किसी भी संस्थान के कायदे-कानून को अच्छी तरह समझ लें। आजकल हर दफ्तर में यह माना जाता है कि आप में इंटेलीजेंस कोशेंट (आईक्यू) और इमोशनल कोशेंट (ईक्यू) के साथ-साथ कल्चरल कोशेंट (सीक्यू) भी होना चाहिए। कोई व्यक्त‍ि यदि आपको ज्यादा पसंद नहीं आ रहा है तो भी आप उसके साथ भी काम करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहें।
ज्यादा ना बोलें
हो सकता है आप बहुत अच्छा जोक क्रैक करते हों और आपके दोस्त आपकी इस अदा पर फिदा हों। पर ऑफिस में हो सकता है यह पसंद न किया जाए. अगर आप बहुत ज्यादा बोलते हैं और दूसरों की बात काटने की आपकी आदत है तो इसे भी बदल लें क्योंकि ऑफिस में आपसे इतनी गंभीरता की उम्मीद की जाती है कि आप पहले दूसरे की बात सुनेंगे और फिर उसका जवाब देंगे। मीटिंग के दौरान भी बार-बार बीच में न बोलें। अगर कोई बहुत अच्छा आइडिया है तो उसे जरूर शेयर करें, पर मीटिंग में यह न लगे कि आप अतिउत्साहित हो रहे हैं.
परफॉर्मेंस के साथ पोलाइटनेस भी
ये बात ठीक है कि ऑफिस में खुद को कार्यकुशल दिखाना जरूरी है, पर इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि आप सीनियर्स और अपने कलीग्स के साथ ठीक से बात करें। काम के दौरान यदि कोई गलती पर टोके तो उस पर तीव्र प्रतिक्रिया देने की बजाय अपनी गलती की जिम्मेदारी लें। इस तरह आप सीनियर्स का दिल भी जीत लेंगे।
संतुलित जवाब दें
ऑफिस में आप नये-नये हैं तो सबसे पहले अपने कलीग्स के मिजाज को समझ लें क्योंकि हो सकता है कि आपके किसी जोक पर उन्हें गुस्सा आ जाए या वो नाराज हो जाएं। इसलिए हंसी-मजाक करने से पहले लोगों के व्यक्त‍ित्व को जान लेना सबसे जरूरी है। इसके अलावा अगर आपसे कुछ पूछ जाए तो उसका जवाब बढ़ा-चढ़ाकर देने की बजाय टू द प्वॉइंट दें। अपनी योग्यता को बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर बताने के बाद यदि आप उस पर खरे नहीं उतर पाए तो इससे आपके सहयोगियों के साथ आपका पेशेवर रिश्ता कमजोर हो जाएगा।
सोशल मीडिया से दूरी
कॉलेज में आप हो सकता है, पूरे दिन में कई बार सोशल मीडिया पर चैट करते हों या अपडेट्स करते हों। ऑफिस में यह नहीं चलता। कुछ संस्थानों में तो सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर प्रतिबंध रहता है। ऐसे में आप अगर ऑफिस समय में अपने फोन या ऑफिस पीसी पर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं तो यह माना जाएगा कि आप काम को लेकर गंभीर नहीं हैं।

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