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बिहार

नीतीश की चाणक्य चाल से अकेले पड़ गए मांझी

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पटना । नीतीश कुमार(nitish kumar) ने बुधवार को अपने मास्टर स्ट्रोक से एक साथ तीन शिकार कर लिये। विधानसभा में जहां बहुत आसानी से विश्वास मत हासिल करके दिखा दिया, वहीं भाजपा को मतदान का बहिष्कार करने के लिए मजबूर कर दिया। लेकिन, इससे भी अधिक जीतन राम मांझी को अलग-थलग करने में कामयाबी हासिल कर ली। कल तक सरकार बनाने का खम ठोक रहे मांझी को उन्होंने बिल्कुल ही अकेला कर दिया। यहां तक कि मांझी के समर्थकों को अपने पक्ष में मतदान के लिए खड़ा कर दिया।

संविधान की 10वीं अनुसूची के प्रावधान का नीतीश कुमार ने खूब फायदा उठाया। भाजपा को चिढ़ाने के लिए यह भी कहा कि यह प्रावधान केंद्र की एनडीए सरकार ने ही किया है। इसी प्रावधान के तहत उन्होंने मांझी को भी पार्टी व्हिप के दायरे में ला खड़ा किया। हालांकि, मांझी सदन में पहले ही असम्बद्ध करार दिए जा चुके थे। मांझी ने सदन में नहीं आकर अपनी सदस्यता गंवाने का रिस्क ले लिया, मगर उनके सहयोगी विधायकों ने यह चुनौती स्वीकार नहीं करने में ही भलाई समझी। नीतीश कुमार को इस बात का एहसास था कि कुछ माह बाद ही चुनाव होने हैं, और कोई भी विधायक, ‘पूर्व विधायकÓ की हैसियत से चुनाव में जाना नहीं चाहेगी। यही कारण था कि जब मांझी सरकार को 20 फरवरी को सदन में विश्वास मत हासिल करना था तब उनके पक्ष में पर्याप्त संख्या में विधायक नहीं जुट पाए। मांझी को तब विश्वास मत प्रस्ताव सदन में पेश करने से पहले ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस बार भी वही हुआ। मांझी के समर्थक विधायकों ने क्रांति का बीड़ा उठाने के बावजूद अपनी सदस्यता कुर्बान करने पर रजामंदी नहीं दिखाई। हालांकि, अब वे कह रहे हैं कि हम जनता के बीच जाएंगे और अपनी बातें रखेंगे, परन्तु जनता भी उनसे यह जरूर जानना चाहेगी कि आखिर अपनी सदस्यता को कुर्बान कर देने की उन्होंने हिम्मत क्यों नहीं दिखाई। मांझी के समर्थकों में से कुछ विधायक पहली बार विधायक बने हैं। उनके लिए यह संभावना भी थी कि सदस्यता जाने की सूरत में वह पेंशन से कहीं वंचित न हो जाएं। ऐसे विधायकों में राजेश्वर राज, सुमित कुमार, अजय प्रताप, राजीव रंजन जैसे नाम शामिल हैं। हालांकि, पिछले कुछ माह से जो राजनीतिक माहौल बना था, उसे भाजपा ने खूब हवा दी थी। लेकिन नीतीश कुमार ने एक झटके में इन सबके प्रयास पर पानी डाल दिया। राजद एवं कांग्रेस में वर्तमान सरकार को लेकर कुछ चर्चाओं से यह भी आशंका थी कि सत्ता पक्ष मत विभाजन की स्थिति नहीं आने देगा। परन्तु, नीतीश सरकार ने दिलेरी दिखाई और विधानसभा अध्यक्ष को ध्वनि मत की जगह लाबी डिविजन से विश्वास मत पर निर्णय लेने का आग्रह किया। नीतीश कुमार ने बार-बार इस बात का जिक्र किया कि उसका जदयू के 40-50 विधायकों के संपर्क में रहने का दावा क्या हुआ? यह भी कहा कि भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडेय बार-बार कहते थे कि जब चाहेंगे, सरकार गिरा देंगे, उसका क्या हुआ? भाजपा ने अपनी ओर से यह कोशिश जरूर की कि वोटिंग की नौबत नहीं आए। यही कारण रहा कि वोटिंग का समय आने से पहले ही भाजपा के सभी सदस्य सदन से वाक-आउट कर गए। लेकिन, उनकी यह रणनीति काम नहीं आई। नीतीश कुमार ने मांझी सरकार के 34 फैसलों को रद करने का भी साहस दिखाया है। अब देखना यह है कि अपने इस फैसले को जनता के समक्ष सही ठहराने के लिए वह कौन सी रणनीति अपनाएंगे।

देश

माली में फंसे झारखंड के 33 मजदूरों की वतन वापसी का रास्ता साफ

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रांची। दक्षिण अफ्रीकी देश माली स्थित भारतीय दूतावास के हस्तक्षेप के बाद वहां फंसे झारखंड के 33 मजदूरों की घर वापसी का रास्ता साफ हो गया है। भारतीय राजदूत अंजनी कुमार ने आईएएनएस को बताया कि सभी मजदूरों की घर वापसी के लिए जल्द ही फ्लाइट टिकट व्यवस्था की जाएगी।

इन मजदूरों को आंध्र प्रदेश की एक ब्रोकर कंपनी के जरिए इलेक्ट्रिक ट्रांसमिशन से जुड़े काम के लिए माली ले जाया गया था। वहां 4 महीने तक काम करने के बाद भी इन्हें वादे के अनुसार वेतन का भुगतान नहीं किया गया। इन मजदूरों के साथ केएसपी नामक एक बिचौलिया भी माली गया था, लेकिन पिछले हफ्ते वह इन्हें छोड़कर भारत लौट आया। इसके बाद वहां रह रहे मजदूरों ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर भारत सरकार और झारखंड सरकार से अपने घर वापसी की गुहार लगाई थी। झारखंड सरकार ने इस पर संज्ञान लेते हुए विदेश मंत्रालय और भारतीय दूतावास से हस्तक्षेप की अपील की थी। माली स्थित भारतीय राजदूत अंजनी कुमार ने यह मामला संज्ञान में आते ही इन मजदूरों से काम ले रही कंपनी के अधिकारियों से बातचीत की।
बीते 18 जनवरी को कंपनी के अधिकारियों और मजदूरों के बीच भारतीय दूतावास की अध्यक्षता में माली की राजधानी बमाको में हुई बैठक में सभी के बकाया वेतन के भुगतान पर सहमति बनी। ये मजदूर जब तक वापस नहीं आते हैं, तब तक इनके आवास और भोजन आदि की व्यवस्था कंपनी ही देखेगी। इनकी वापसी की टिकट की व्यवस्था भी कंपनी की ओर से की जाएगी। भारतीय राजदूत अंजनी कुमार ने कहा कि मजदूरों और उनके परिजनों के परिजनों को अब किसी तरह की चिंता करने की जरूरत नहीं है। दूतावास इन सभी की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित कराएगा।

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बिहार : स्कूल में चल रही थी ‘शराब पार्टी’, पहुंच गई पुलिस, हेडमास्टर सहित 3 शिक्षक गिरफ्तार

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नवादा। बिहार में जहां शराबबंदी कानून के कार्यान्वयन को लेकर विपक्ष सरकार पर लगातार निशाना साध रही है, वही सराकारी कर्मचारी भी इस कानून की धज्जियां उड़ाने में पीछे नहीं है। ऐसा ही एक मामला नवादा जिले के वारिसलीगंज थाना क्षेत्र के एक स्कूल से सामने आया जहां, शिक्षक शराब की पार्टी कर रहे थे और पुलिस पहुंच गई। पुलिस ने प्रधानाध्यापक (हेडमास्टर) समेत 3 शिक्षकों को गिरफ्तार किया है।

पुलिस के एक अधिकारी ने गुरुवार को बताया कि बुधवार की शाम पुलिस को सूचना मिली कि वारिसलीगंज नगर परिषद क्षेत्र के सामबे गांव स्थित मध्य विद्यालय में कुछ लोग शराब की पार्टी कर रहे हैं।
इसी सूचना के आधार पर पुलिस स्कूल पहुंच गई और मौके से प्रधानाध्यापक सुनील कुमार सहित तीन शिक्षकों को शराब पीते गिरफ्तार किया गया।वारिसलीगंज के थाना प्रभारी पवन कुमार ने बताया कि गिरफ्तार लोगो में सुनील कुमार के अलावा रजनीकांत शर्मा और प्रमोद कुमार सिंह हैं। उन्होंने बताया कि ये दोनो दूसरे स्कूल के शिक्षक हैं।
थाना प्रभारी ने बताया कि घटनास्थल से शराब की एक खाली बोतल भी बरामद की गई है। तीनों शिक्षकों की चिकित्सकीय जांच के बाद शराब पीने की पुष्टि भी हुई है। पुलिस अब पूरे मामले की जांच कर रही है। उल्लेखनीय है कि राज्य में किसी भी प्रकार की शराब बिक्री और सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध है।

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देश

तेजस्वी यादव के तेलंगाना सीएम चंद्रशेखर से मुलाकात ने बढ़ाई कांग्रेस की परेशानी!

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पटना। बिहार में मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रमुख नेताओं में शामिल तेजस्वी यादव के हैदराबाद जाने और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर से मुलाकात के बाद इसके सियासी मायने निकाले जाने लगे हैं। इस मुलाकात के बाद कांग्रेस में हालांकि छटपटाहट है, लेकिन कोई नेता फिलहाल इस मुलाकात को ज्यादा तरजीह देने के मूड में नहीं है।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर ने राजद के प्रमुख लालू प्रसाद के पुत्र तेजस्वी से मुलाकात के पहले वामपंथी दलों के प्रमुख नेताओं से भी मुलाकात कर चुके हैं। अब बिहार में सबसे बड़े दल राजद के बड़े नेता से चंद्रशेखर से मुलाकात को लेकर तीसरे मोर्चे (गठबंधन) की शुरूआत मानी जा रही है।
कहा जा रहा है कि जिस प्रकार पिछले साल हुए बिहार विधानसभा उपचुनाव में दो सीटों पर हुए चुनाव में राजद ने महागठबंधन की सहयोगी पार्टी कांग्रेस को झटका देते हुए दोनो सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए थे, उससे यह तय हो गया था दोनो पार्टियों के रिश्ते में खटास आ गई है। बाद में हालांकि कांग्रेस ने भी अपने प्रत्याशी उतार दिए थे।
माना जा रहा है कि इस मुलाकात का साइड इफेक्ट अभी से बिहार में दिखने भी लगा है। बिहार में स्थानीय निकाय कोटे से विधान परिषद की 24 सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर राजद अपनी ही सहयोगी पार्टी कांग्रेस को कोई तरजीह देने के मूड में नहीं है।
भाजपा के उपाध्यक्ष राजीव रंजन तो कहते है कि विधानसभा उपचुनाव में महज एक सीट के लिए कांग्रेस को पूरे बिहार के सामने अपमानित करने के बाद अब विधान परिषद सीटों को लेकर राजद ने एक बार फिर कांग्रेस को उसकी औकात दिखा रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को बिहार में राजद के तले ही कांग्रेस को राजनीति करनी होगी।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा भले ही इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व से बातचीत की बात कह रहे हों, लेकिन राजद द्वारा प्रत्याशी तय करने की भी सूचना है।
इधर, उत्तर प्रदेश चुनाव में भी कांग्रेस से क्षेत्रीय पार्टी समाजवादी पार्टी ने दूरी बना ली है, जबकि अन्य भाजपा विरोधी पार्टियों को तरजीह देते दिख रही है।
वैसे, तेजस्वी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री की मुलाकात को शुरूआत बताया जा रहा है, लेकिन इसके मायने बड़े निकाले जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी बनाए दलों को एकजुट करने का प्रयास है।
इस बीच, राजद और कांग्रेस के नेता इस मुलाकात को लेकर ज्यादा खुलकर नहीं बोल रहे। दोनो दलों के नेता इसे राजनीतिक लोगो की मुलाकात और शिष्टाचार मुलाकात बता रहे हैं।
बहरहाल, बिहार सहित कई राज्यों में सहयोगी दलों के जरिए अपनी पहचान कायम रखने में कामयाब रही कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी ताकत भाजपा विरोधी दल ही माने जाते थे। ऐसे में अगर कांग्रेस का ऐसे दलों का साथ छूटा तो बड़ी परेशानी से इंकार नहीं किया जा सकता है।

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