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मध्यप्रदेश

विश्व हिंदी सम्मेलन : संख्या बढ़ाने को शिक्षकों व प्राचार्यो को बुलावा

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भोपाल| मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में होने जा रहे 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में विद्वतजनों की संख्या कम न रह जाए, यह आयोजकों के लिए चुनौती का विषय बन गया है, यही कारण है कि हर जिले के जिलाधिकारी को 50 से लेकर 500 तक शिक्षकों और प्राचार्यो को भोपाल भेजने का लक्ष्य सौंपा गया है। (world hindi conference 2015) राजधानी के लाल परेड मैदान जो अब माखनलाल चतुर्वेदी नगर का रूप ले चुका है, वहां 10 से 12 सितंबर तक विश्व हिंदी सम्मेलन होने जा रहा है। इस सम्मेलन में देश और दुनिया के पांच हजार हिंदी विद्वानों के आने का आयोजक दावा कर रहे हैं। यह आयोजन विदेश मंत्रालय का है और सहभागी राज्य सरकार है।

सूत्रों का कहना है कि सम्मेलन के लिए बुलावा तो बड़ी तादाद में हिंदी विद्वानों को भेजा गया है, मगर संख्या अनुमान से कम रह जाने इसकी आशंका भी बनी हुई है, इसलिए हर जिले से विद्यालयों के प्राचार्य और शिक्षकों को बुलाने का फैसला हुआ है। किसी जिले से 50 तो कहीं से 500 प्राचार्यो और शिक्षकों को भोपाल भेजने की जिम्मेदारी जिलाधिकारियों को सौंपी गई है।

मजे की बात यह है कि सरकार की ओर से विद्वानों को भेजने का जिम्मा जिलाधिकारी को सौंपा गया था, तो उन्होंने यह जिम्मेदारी जिला शिक्षाधिकारियों को सौंप दी। इंदौर के जिला शिक्षाधिकारी का लिखा गया पत्र जो आईएएनएस के हाथ लगा है, उसमें अन्य अधिकारिकारियों से साफ तौर पर कहा गया है कि हिंदी सम्मेलन के लिए 10 सितंबर को जिले से 500 शिक्षक या प्राचार्य को भेजा जाना है, इनके लिए उसी दिन सुबह चार से साढ़े चार बजे के बीच तयशुदा स्थल पर वाहन सुविधा उपलब्ध रहेगी।

टीकमगढ़ जिले के जिला शिक्षाधिकारी बी.एस. देशलेहरा ने चर्चा करते हुए स्वीकारा कि जिलाधिकारी के आदेश पर उन्होंने हिंदी सम्मेलन के लिए 50 शिक्षकों की सूची भेजी गई थी, मगर कार्ड सिर्फ 10 के ही आए हैं।

इस तरह राज्य के सभी 51 जिलों से 50 और उससे अधिक शिक्षकों व प्राचार्यो को सम्मेलन के लिए भोपाल भेजने के निर्देश दिए गए हैं। अगर औसत रूप से 50 शिक्षक भी हर जिले से आए तो यह आंकड़ा ढाई हजार से ऊपर पहुंच जाएगा। वहीं कुल विद्वानों की संख्या पांच बताई जा रही है, इस लिहाज से सम्मेलन में कुल संख्या के आधे शिक्षक और प्राचार्य होंगे।

हिंदी सम्मेलन में शिक्षकों को मिले बुलावे पर साहित्यकार रामप्रकाश त्रिपाठी का कहना है कि शिक्षक सरकारी कर्मचारी होता है, लिहाजा वह किसी भी बात पर असहमति नहीं जता सकता, वहीं विशेषज्ञों को बुलाने पर वे सहमति और असहमति जता सकते हैं। इससे लगता है कि सरकार नहीं चाहती कि उसकी किसी बात पर कोई असहमति जताए, इसीलिए शिक्षकों को बड़ी संख्या में बुलाया जा रहा है।

जाने-माने कवि राजेश जोशी पहले ही यह सवाल उठा चुके हैं कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि यह सम्मेलन किसका है, अगर शिक्षकों का सम्मेलन है तो यह भी स्पष्ट किया जाए।

देश

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने संघ की तुलना ‘दीमक’ से की

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इंदौर । मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना दीमक से की है। इंदौर में युवक कांग्रेस के कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री सिंह ने आरएसएस पर हमला करते हुए कहा, “आप ऐसे संगठन से लड़ रहे हैं, जो ऊपर से नहीं दिखता। जैसे घर में दीमक लगती है, यह उसी तरह से काम करता है।”

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा, “मैं समझता हूं कि जब यह कहूंगा, तो सबसे ज्यादा गालियां खाऊंगा, क्योंकि मैंने आरएसएस की तुलना दीमक से की है।”
उन्होंने कहा कि संघ रजिस्टर्ड संस्था नहीं है। इसकी सदस्यता नहीं है, कोई अकाउंट नहीं है। संघ का कोई कार्यकर्ता जब आपराधिक कृत्य में पकड़ा जाता है, तो वे कहते हैं कि हमारा सदस्य ही नहीं है। यह ऐसा संगठन है, जो गुपचुप और छुपकर काम करता है। ये लोग केवल कानाफूसी करते हैं और गलत भावना फैलाते हैं। कभी आंदोलन नहीं करते और न ही किसी की समस्या के लिए लड़ते हैं।
उन्होंने सीधे तौर पर संघ पर हमला करते हुए कहा, “आरएसएस की विचारधारा नफरत की है। हिंदुओं को खतरा दिखाकर डर पैदा करो और डर पैदा करके बताओ कि हम ही तुम्हारी रक्षा कर सकते हैं, बाकी कोई नहीं कर सकता। आज जब राष्ट्रपति से लेकर नीचे तक के पदों पर हिंदू हैं, तो फिर खतरा किससे है?”

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देश

मानहानि मामले में मध्य प्रदेश की अदालत ने सीएम सहित दो अन्य को जारी किया नोटिस

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भोपाल। मध्य प्रदेश की एक जिला अदालत ने हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा द्वारा दायर मानहानि मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने चौहान के अलावा शहरी विकास मंत्री भूपेंद्र सिंह और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी. शर्मा को भी उसी मामले में नोटिस जारी किया है, जिसमें कांग्रेस नेता ने ओबीसी आरक्षण के संबंध में ‘गलत तथ्यों का प्रचार’ करके उन्हें बदनाम करने का आरोप लगाया है।

कांग्रेस सांसद ने सर्वोच्च न्यायालय में ओबीसी आरक्षण मामले के बारे में कुछ टिप्पणियों को लेकर चौहान और दो अन्य के खिलाफ जबलपुर जिला अदालत में मामला दायर किया था। तन्खा ने कहा कि अदालत ने उनसे जवाब मांगा है और अगली सुनवाई की तारीख 25 फरवरी तय की है।
तन्खा ने कहा कि “मुझे अपने वकील (वाजिद हेडर) से जानकारी मिली है कि 10 करोड़ के मूल्य के नुकसान के हमारे दावे में, जबलपुर कोर्ट ने मुख्यमंत्री और अन्य प्रतिवादी पक्षों को अपना जवाब प्रस्तुत करने के लिए नोटिस जारी किया है। अदालत मामले पर 25 फरवरी को सुनवाई करेगी। तब से, सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश राज्य चुनाव आयोग (एसईसी) को स्थानीय निकाय में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षित सीटों पर मतदान प्रक्रिया पर रोक लगाने और सामान्य वर्ग के लिए उन सीटों को फिर से अधिसूचित करने का निर्देश दिया। सरकार ने पंचायत चुनाव रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में तन्खा पर ओबीसी आरक्षण कोटा का विरोध करने का आरोप लगाया है।
यह तब शुरू हुआ, जब तन्खा स्थानीय कांग्रेस नेताओं द्वारा दायर एक याचिका के वकील के रूप में पेश हुए, जिसमें 2014 के रोटेशन और आरक्षण के आधार पर राज्य में पंचायत चुनाव कराने के लिए भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार के अध्यादेश को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने राज्य में समुदाय (ओबीसी) को आरक्षण प्रदान करने में बाधा उत्पन्न करने के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगाए। राज्य विधानसभा के हाल ही में संपन्न शीतकालीन सत्र के दौरान ओबीसी मुद्दे पर घंटों बहस हुई थी।

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देश

सावित्रीबाई फुले को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने याद किया

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भोपाल। छुआछूत मिटाने, विधवा विवाह कराने और महिलाओं को शिक्षित करने का अभियान चलाने वाली सावित्रीबाई फुले कि आज सोमवार को जयंती है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उनके छायाचित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें याद किया।

मुख्यमंत्री चौहान ने महान समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले की जयंती पर उन्हें नमन किया। मुख्यमंत्री चौहान ने निवास कार्यालय स्थित सभागार में उनके चित्र पर माल्यार्पण कर पुष्पांजलि अर्पित की।
सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थी। सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जिया, जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह कराना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना। सावित्रीबाई फुले ने 3 जनवरी 1848 में पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की 9 छात्राओं के साथ महिलाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की । लड़कियों की शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी।
सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ स्वयं पढ़ी अपितु दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया। दस मार्च 1897 को प्लेग के कारण सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया।

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